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सपने

मन करता कि उस नोटबुक को जला दूँ। आख़िर कब तक किसी जवाब की प्रतीक्षा में बीती रात के सपनों को लिखता रहूँ। एक सपना था कि मैं किसी रेल्वे स्टेशन के प्लेटफॉर्म के पास सिगरेट पी रहा था कि अचानक मेरे कंधे पर किसी ने हाथ रखा। मैंने मुड़कर देखा। उसके चेहरे पर किसी अनहोनी के निशान थे। उसकी मुस्कान में मुझे किसी अजाने भय की दस्तक दिखाई दी। मैं आधी सिगरेट जलती हुई छोड़कर वहाँ से भागता हुआ प्लेटफॉर्म पर पहुँचा। मैं जल्दी से किसी ट्रेन पर चढ़ जाना चाहता था। मुझे किसी अनहोनी का डर था। मैं फंस गया था। मैं बुरी तरह घबराया हुआ था किंतु बाहर पूरी तरह समान्य बना हुआ था। मैं लोगों से बार बार पूछता कि यह ट्रेन कब आएगी? क्या आएगी भी? और अगर मैं किसी कारण एक ट्रेन को न पकड़ सका तो क्या दूसरी आएगी? लोग मेरे चेहरे की घबराहट पढ़कर तसल्ली भरे भाव के साथ कहते कि हाँ, तुम अपने गंतव्य पहुंच जाओगे। इतना घबराने की जरूरत नहीं है। मैं एक प्लेटफॉर्म से दूसरे प्लेटफॉर्म पर जाता। यह सोचकर कि क्या पता ट्रेन इधर के बजाय वहाँ आ जाए। मैं बेतहाशा घबराया हुआ था। अचानक मैं बेहोश हो गया। ऐसा बेहोश जिसमें मेरा शरीर अचल था परंतु मे...

हम जैसे हैं वैसे

कभी कभी हम काम, दौलत, नाम, शोहरत के पीछे अंधाधुंध दौड़ते जाते हैं। लालच वासना और हवस को प्रेम समझकर बाइक के पीछे दौड़ रहे कुत्ते की तरह भागते हैं।  किसी रोज़ अचानक मुँह पर एक लात पड़ती है। तो बैठकर सोचते हैं कि ये क्या कर रहे थे?  मुझे बचपन से ही साफ़ सुनने में प्रॉब्लम रही है। एक बात को सुनने के लिए मैं सामने वाले को दो से तीन बार कहने को मजबूर करता हूँ। हालाँकि कभी कभी महसूस होता है कि ये प्रॉब्लम से ज्यादा मेरी आदत बन चुकी है। संजय जी ने कहा कि मशीन लगा लो। धीरे धीरे आदत पड़ जाएगी तो उसका असर दिखना स्टार्ट हो जाएगा। मशीन मेरे पास सालों से पड़ी थी मग़र मैं लगाने से डरता था दोस्त हंसेंगे। कि लोग देखेंगे तो क्या क्या उपहास करेंगे।  मशीन लगाने के कुछ दिनों तक मैं बैचैन रहा। लगता रहा जैसे मुझसे मैं छूट रहा हूँ। कई बार मैंने बीच बीच में लगाना छोड़ भी दिया। मग़र ऑफिस में संजय जी को देखता तो फ़िर लगा लेता। उनके डर से मैंने 1 साल की मशीन की बैट्री ऑर्डर कर दी।  मशीन ने कुछ कुछ काम करना शुरू किया है। मैं बहुत झीनी और महीन आवाजें महसूस करने लगा हूँ। जैसे पंखे की ...

जैसे...

वॉयलिन की कोई उदास धुन बजाते हुए, जैसे मर गया हो कोई संगीतकार। जैसे कोई बूढ़ा ठहर गया हो अपनी आखिरी खुराक खाने से पहले ही। जैसे मुस्कराते हुए हिरन की गर्दन काट दी हो शिकारी ने और वह भूल गया हो आखिरी तड़प के दर्द को चेहरे पर लाना।  जैसे पुकारा हो तुमने मेरा नाम आखिरी बार जैसे मैं कर रहा हूँ इंतजार तुमसे मिलने का,  आखिरी बार।

क्या कीजै

बेमौसम आई बरसात की तरह प्रेम हमारे सामने से निकल जाता है। हम भीगना चाहते हैं मग़र आदतन छाता लेकर खड़े हो जाते हैं। बरसात चली जाती है और तब हम खुद को कोसते हैं कि क्या खड़े खड़े डर रहे थे और देखते रह गए? क्यूँ न भीग गए? वह क्या था जिसने हमें रोके रखा?  प्रेम जिससे हो जाए उससे करो। मग़र साथ उसके रहो जो तुम्हारी जिम्मेदारी उठा पाए। यह हमें बचपन से ही सिखाया जाता है। क्या उम्र और समझ बढ़ने के साथ-साथ प्रेम बुझ जाता है? या फिर प्रेम छूट जाने पर हम बड़ा और समझदार होना महसूस कर पाते हैं? हम दोनों ही इन सवालों का जवाब नहीं तय कर पाए।  इसलिए तुम वहाँ हो और मैं यहाँ हूँ।  तुम मुझे भूल जाने को मजबूर हो,  मैं तुम्हें याद आने को मजबूर हूँ।  क्या कीजै?

सबसे बड़ा सुख

सब कुछ भूल जाता हूँ मैं, इक तुम्हारा नाम याद आते ही। मैंने सुख की शक्ल में कुछ दुःख जेबों में भर लिए थे। या हो सकता है सुख के बीच छिपे दुःख उठा लिए हो, अनजाने ही। जैसे मैं कई बार मूँगफली के बीच छिलके उठा लिया करता हूँ। उन दुखों को बीन कर मैंने रख दिया है कालीन के नीचे। कि मैं नहीं बाँटना चाहता उन्हें किसी के साथ। मैं बस एक सुख चाहता हूँ। एक भरे पेड़ जितना घना सुख। जैसे काश तुम होती मेरे पहलू में तो मैं यूँ लिख ना रहा होता ये बेवजह की बात। मैं तुम्हें अपने दुःख सुनाता जाता और चूमता जाता तुम्हारे नर्म गुलाबी गालों को। तुम अपनी आँखें बंद कर लेती। खिड़की पर बैठी बिल्ली चाँद को बुझा देती। रात ढंक लेती खुद को रज़ाई से। और सुबह भूल जाती जागना। इससे बड़ा सुख और क्या होगा कि किसी सुबह मैं जागूँ गहरी नींद से और तुम मेरी बाहों में लिपटी हो। तुम मग़र उदास वहाँ, मैं भी हूँ तन्हा यहाँ। बस दूरियाँ हैं हमारे दरमियाँ। बस दूरियाँ, ओ जानाँ....

नियति

खिड़की से हवा का एक झोंका आता। डेस्क पर रेत पसरती जाती। किताबों के पन्ने कुछ पल कांपते और ठहर जाते। जैसे कोई थका हुआ मजदूर गहरी नींद से अचानक उठ गया हो और फिर से सो गया हो। काम करते अचानक जब ऊब होने लगती तो आँखें कौने कौने को ऑब्जर्व करने लगती। ऊपर लगी खिड़की से आती रोशनी की परछाई में एक मकड़ी ने जाल बुना है। एक मकोड़ा कुछ देर उस जाल में फंसा छटपटाता है और फिर आहिस्ता आहिस्ता दम तोड़ देता है। जैसा कि एक रोज़ लालच से उपजे प्रेम का हाल होता है। मैं अपने कैबिन से बाहर आ जाता हूँ। टहलते हुए अचानक उलझन में खो जाता हूँ कि मकोड़े के हाल पर आश्चर्य किया जाए या दुःखी हुआ जाए। ऐसा सोचते मैं अचानक एक मकोड़े में बदल जाता हूँ और धूल भरी सड़क पर रेंगने लगता हूँ। चलते हुए अचानक पाता हूँ कि आगे किसी ने जाल बिछाया हुआ है। मैं कुछ पल को ठहर जाता हूँ। अचानक ख्याल आता है कि सबकी अपनी नियति होती है कि जिसे जहाँ जाना होता है वह उसी तरफ़ जाता है।  हो सकता है कि उसके जाल में फंसना ही मेरी नियति हो। दूर से चमकती उसकी आँखें रेगिस्तान में पानी के भ्रम के जैसी थी। मैं अपने हाल पर मुस्कराता हूँ और ...

ऑफिस जिंदगी

कभी काम में घंटों व्यस्त रहते। कभी अचानक बैचैन होकर कुर्सी से उठ जाते और सोचते कि जिंदगी क्या शै है? क्या यूँ ही ऑफिस आते जाते, दोस्तों से मिलते और ऑफिस का काम करते हुए मर जाएंगे? जिदंगी मग़र कोई रिप्लाई नहीं देती। बस किसी पेड़ की डाल पर अलसाये पड़े उदबिलाव की तरह तकती जाती है। किसी दोस्तों ने कारोबार जमाया। दो एक ने शादी की। मैं उनके जश्न में पीता हुआ सोचता रहा कि क्या ये आगे बढ़ रहे हैं और मैं पीछे रह गया हूँ? अचानक एक दो मैसेज टाइप करता हूँ कि 'तुमसे प्यार है। मिलो।' जिंदगी की तरह मग़र वहाँ से भी कोई जवाब नहीं आता।  दिन गुज़रते जाते हैं। काम बढ़ता जाता है। मैं कम होता जाता हूँ। मिट जाने के डर से मुक्ति पाने के लिए लिखने लगता हूँ। तुम्हें पता है रोहन, सब कुछ अपनी गति से आगे बढ़ रहा है। कोई भी और कुछ भी आगे या पीछे नहीं होता। जिस फूल को डाल से गिरने में मौसम लग जाते हैं वही फूल हवा के एक झोंके से मिट्टी की बाहों में समा जाता है।  ज्यादा सोचा मत करो। समझे?  चियर्स। लव यू। 

होंठो से मुझे देखो

तेरी यादों को छुपा लूँ अपने ब्लॉग्स के ड्राफ़्ट में भेज दूँ अपनी तन्हाई तुझे,  भरकर खाकी लिफाफे में लोग जब अपने घरों को लौटने लगते हैं जब दोपहर के वक्त पसरने लगती है उदासी तब न जाने ये कैसे खयाल आते हैं कंप्युटर, प्रिंटर, मेज़ सड़क से उड़ती रेत से ढंक जाते हैं  जैसे बीते लम्हों की याद से बचना नामुमकिन हो पर एक दिन जब मिलेंगे हम किसी बस की आखिरी सीट पर  टकरा जाएंगे किसी किस्से के दिलचस्प से इक मोड़ पर तब तुम मुझे याद दिलाना कि तुम से कोई बात कहनी है जिसे सुनकर तुम आँखों से मुस्कराओ और होंठो से मुझे देखो।

हम जो चाहते हैं

ट्रैफिक में फंसी कार की तरह साँसे चलती हैं और ठहर जाती है। दिल धड़कता है फिर चुप हो जाता है। सुबह होती है। दिन ढ़ल जाता है। शाम दूर जाती किसी टैक्सी की तरह बुझती जाती है।  सड़क पर शोर बनते और बुझते हैं। बस की खिडकियों के शीशों से निकलती धुन एक सम्मोहन बाँधती हैं। मैं सड़क के किनारे बने तंबुओं को देखने लगता हूँ। एक कोई अधेड़ उम्र की महिला ईंटों का चूल्हा बनाकर रोटी सेंक रही है। अंदर बेड में कोई आदमी टीवी देखता लेटा हुआ है। वे बस में बैठे बैग लिए लोगों से कितने अलग हैं। उनके चेहरे पर कोई शिकायत नहीं है। जैसे कि वे जो चाहते थे उन्हें मिल गया हो। घर लौटने के इंतजार में घर आ जाता है। हम सड़क पर चलते हुए सोचते हैं कि किसी पुराने वक्त से टकरा जाएं। किसी से मिलने पर चाहने लगते हैं कि कुछ देर साथ ठहर कर बातें कर लें। और कभी किसी के साथ ठहरे हुए अचानक ऊब जाते हैं। असल में हम जो चाहते हैं वह हर पल घटित हो रहा है। हमने अपने ख्वाबों में जैसे जीवन के बीज बोए थे वे असल में खिल चुके हैं। जिस जीवन की हम कामना करते हैं असल में वह हमारे साथ ही चल रहा होता है। हम यह बात जानते भी हैं मग़र म...

बारिशें

कबूतर बैठ जाते हैं बिजली की तारों पर बच्चे दौड़ पड़ते हैं सड़कों पर छपाके मारते हुए बादल निकल पड़ते हैं शहर देखने  हवा की कमर में हाथ डाले और मैं बैठ जाता हूँ  अँगुलियों में कलम फंसाये और हाथों में डायरी लेकर।  कि सबका अपना अपना अंदाज़ होता है  बारिशों में भीगने का। 

फाटक

रेल्वे फाटक के सिग्नल की तरह दिल पता नहीं किसके इंतजार में खड़ा रहता है,  हसरतों की सड़क पर।  *** आजकल दिन चुपके से गुजर जाते हैं। शामें आहिस्ता से रात के पहलू में सिमट जाती हैं। मैं बस की पिछली सीट पर बैठा ये सोच रहा होता हूँ, कि हवा मेरे चेहरे पर लिखती जाती है कोई भीगा नग़मा। मैं आसमान में घर लौटते पंछियों से पूछता हूँ कि आज क्या जिया? कैसे पता करोगे कि ये दिन सिर्फ गुज़ारा भर है या जिया भी है? पेड़ से पत्ते गिरते हुए ठहर जाते हैं। पंछी चहक कर भूल जाते हैं अपनी चोंच बंद करना। ऑफिस की पास वाली गली में गुज़रते हुए मज़दूर फेंक देते हैं अपनी आधी बची सिगरेटों को। लड़कियां तोड़ देती हैं अपने बैग में छुपाया हुआ आईना। मैं ख़ुद से पूछता हूँ कि क्या बात है डियर, ये कैसे सवाल कर रहे हो? मन किसी डांट खाते बच्चे की तरह चुप खड़ा रहता है। दिल में कई हसरतें मुट्ठी से फिसलती रेत की तरह बिखर जाती हैं।  जब कोई जवाब नहीं मिलता तो मैं लिखने लगता हूँ ये छोटी छोटी बातें। एक झुंड पंछियों का शोर करता हुआ गुज़र जाता है शहर के ऊपर से। हसरतें। ख़्वाब। ज़िंदगी। शाम। तुम। 🤍 #poetry #ins...

प्रेम...

छत पर मूँगफली के छिलके बिखरे पड़े हैं उन्हीं के बीच पड़े हैं कुछ दाने ठुकराए हुए से  जैसे कोई जरूरी कामों के बीच  भूल गया हो प्रेम को। *** वह दोनों सड़क के किनारे शायद किसी बस के इंतजार में खड़े थे। लड़की ने अपने कंधे पर एक बड़ा सा डफल बैग टांग रखा था। लड़के के दोनों हाथ जीन्स की जेब में थे। उसने अपनी शर्ट के पॉकेट से लाइटर निकाला और एक सिगरेट जला ली। लड़की की आँखें हवा के हर झोंके के साथ धुएँ से भर जाती। लड़का उसकी तरफ़ देखता तो वह मुस्कुरा देती। प्रेम भी पता नहीं क्या चीज़ होती है। कोई कर के पछताता। कोई ना करके।  *** दिल बेधड़क सुर बुनता जाता है। ज़िंदगी अपनी रफ़्तार से बीतती जाती है। दिन ऑफिस के कामों में कट जाता है। रात करवटें लेते गुजर जाती है। इसी बीच मुझे तुम्हें प्यार करना होता है। इन्हीं सब के बीच मैं तुम्हें याद करता हूँ। तुम्हारे लिए तोहफ़े सोचता हूँ, झुमके चुनता हूँ और पायलें लेता हूँ।  जरूरी नहीं कि जो दिन भर मैसेज न करता हो वह याद भी न करता हो।  समझा करो।  कि जिंदगी बिखरी हुई है और उसे बुहारने वाला लापता है। #Rohankidiary #poetry #...

सपने

हर हकीकत एक सपने से शुरू होती है। सपने तुम्हारी हसरतों के पौधे होते हैं। जब भी वक्त मिले उनसे पूरे मन से मिलो। उनके पास बैठो, उन्हें गले लगाओ। ख़ुद से पूछो कि इस ख्वाब को ताबीर करने के लिए तुम्हें क्या करना होगा? लाइफ का असली मकसद जवाब ढूँढना नहीं, बल्कि वे सवाल ढूँढना है जिनके जवाब तुम्हारे अंदर छिपे हुए हैं। चियर्स! 💫

मेरा लालच

हॉट स्टार पर चलते आईपीएल की तरह ज़िन्दगी ठहर जाती है कई बार उलझनों की बफरिंग की वजह से। ऐसे में क्या मुझे ज़िन्दगी रिस्टार्ट कर देनी चाहिए मोबाईल की तरह? या फ़्लाइट मोड में डाल कर छोड़ देनी चाहिए कुछ देर के लिए कि सारी चिंताएँ ऐरोप्लेन की तरह उड़ जाएं सर के ऊपर से। कुछ नहीं सूझता। घर से ऑफिस जाते हुए बस में किताब खोल लेता हूँ। अपने सफ़र में खो जाता हूँ। आगे वाली सीट पर बैठी लड़की ने एक इयर पीस अपने लेफ्ट कान में लगा रखा है और एक को अपने दाँतों में। माइक उसकी गर्दन पर लटका हुआ है। उस पार से शायद किसी ने लव यू कहा हो कि वह कुछ देर राइट इयर पीस को अपनी अँगुली में घुमाती है और कुछ देर सोचने के बाद हल्के से कहती है 'टू यू ट'। उसने यह कहने से पहले कुछ देर क्या सोचा था? हर दिल चिटका हुआ है मोबाइल की स्क्रीन की तरह। हर शख्स तन्हा है चौराहे पर खड़ी की मूर्तियों की तरह। मैं मग़र तुम्हारी याद में ही भीगा रहता हूँ। जब चाहूँ तुम्हें छू सकता हूँ अपनी अँगुलियों में। तुम्हें देख सकता हूँ अपनी आँखों में। तुम्हारे होने को तुम्हारे होने की ज़रूरत नहीं है। ये तो मेरा लालच है कि तुम पास...

सपना ही होगा शायद

नदियाँ लौटने लगीं अपने उद्गम की ओर। हवा ठहर कर शांत हो गई। पेड़ बढ़ने की बजाय सिमट गए अपनी जड़ों में।  समंदर उड़ गया ऊपर की ओर बारिश बन कर। और बूढ़े आदमी दौड़ने लगे एक गेंद के पीछे और बच्चे हो गए। सपना होगा शायद ये आज दोपहर का कोई। सच तो नहीं ही हो सकता। वर्ना तुम भी लौटकर चली आ रही होती मेरी तरफ़।

जिंदगी न हुई

सोचते थे कि दिन भर दोस्तों के साथ पड़े रहेंगे। गिलासों से बूंदे सरक रही होगीं। शीशे की मेज़ पर चिप्स बिखरे होंगे। कोई रोक टोक करेगा तो उसकी कमर पर एक जोर की ठोकर मारेंगे।  मग़र क्या मालूम था कि दिन भर औंधे पड़े प्याले की तरह कुर्सी में पड़े रहेंगे और कीबोर्ड पर अंगुलियाँ घुमाते रहेंगे। कब सोचा था कि उसकी बाहों को छोड़ दीवारों से सिर टिकाना पड़ेगा।  जिंदगी न हुई कच्ची उम्र का प्रेम हो गया। साथ बैठे हैं मग़र समझ नहीं आ रहा कि क्या करें। मग़र कोई नी। ए जिंदगी, तुम जैसी भी हो बेहद सुंदर हो। लव यू। 

लिखना

किसी को ऑफिस में छुप कर देखते जाना और उसके देखते ही पानी की बोतल ढूँढने लगना बीच सड़क पर किसी की कमर में हाथ डाल देना किसी को भरी मार्किट में बेपरवाह चूम लेना किसी का हाथ खींचकर दिसम्बर की इक रात में  अपने ऊपर ओढ़ लेना भरी गर्मी की दोपहर में किसी की गर्दन पर रखी बूँदों को पी लेना  किसी को सितारों भरी रात में छत पर बिछा लेना।  ये सब उतना ही रोमांचक है जितना कि इन लम्हों को लिख लेना। कि लिखना बीते और आने वाले लम्हों को फ़िर से जी लेना है। 

तुम हो कि...

जादूगर मूँगफली वाले की तरह अपने पिटारे से तरह-तरह के अचम्भे निकालता जाता। लोग कपड़े की दुकान के आगे खड़े पुतले की तरह देखते जाते। लोगों को लगता कि वे जादू के सम्मोहन में है। मग़र असल में यह शाम थी जो उनकी आँखों में तिलिस्म फूँक रही थी।  मैं इस मायाजाल में नहीं फंसता हूँ कि मेरी जेबों में तुम्हारे होंठो के गुलाबी फाहे रखे हैं। दिल में तुम्हारे बालों में फंसे क्लेचर की चुभन अटकी हुई है। गर्दन में तुम्हारे दाँतों की टीस है जो मुझे इस मायावी दुनिया से मुक्त रखती है। मैं एक शैतान हूँ और तुम शैतान की प्रेमिका। मेरे यह कहते ही तुम मेरे गालों पर अपने दांत गड़ा देती हो। हरी नीली बसें एक्सीलेटर छोड़कर ब्रेक लगा देती हैं। ट्राफिक पुलिस वाला सर पे हाथ रखकर बैठ जाता है एटीएम के बाहर बने फुटपाथ पर। मूँगफली वाला देखने लगता है दूसरी तरफ़ जैसे उसने कुछ देखा ही न हो अभी अभी।  अभी तो सर्दियाँ शुरू भी नहीं हुई और तुम हो कि ओस की तरह गिरने लगी हो मुझपर। रहम करो कि बरबाद हो जाएगा ये शहर भी मेरी तरह।  मैं और तुम। जैसे कोई कहानी। हैं भी और नहीं भी हैं हम। चियर्स। 

क्या पहले बता देना चाहिए था?

मैं हर शाम बालकनी में आराम कुर्सी पर बैठा किताब पढ़ता। कहीं पास से कुछ चिडियों के बच्चों की आवाजें आती। एक रोज़ में किताब कुर्सी पर रखकर उन आवाजों का पीछा करने लगा। घर के पिछवाड़े में रखे कबाड़े पर एक पेड़ गिरकर टूट गया था शायद। उसमें से दो नन्हीं सुराहीदार गर्दन दिखाई दी। मैं अचम्भे से भर गया कि जीवन का कोई ढब नहीं है कि वह अनपेक्षित जगहों पर भी खिल उठता है।  मैंने उस घोंसले को उठाकर पास के पेड़ पर रख दिया। शाम को मम्मा बुलबुल बच्चों की आवाजों का पीछा करते हुए सीधे उस पेड़ पर पहुँच गई। या शायद उसने मुझे घोंसला वहां रखते हुए देख लिया हो। पता नहीं। अगली शाम मैं आदतन कुर्सी पर बैठा किताब पढ़ रहा था। मैंने देखा कि वह बुलबुल कपड़े सुखाने के तार पर आकर बैठ गई है। वह मुझे एकटक देखती रही जैसे पूछना चाहती हो कि तुमने मेरे लिए इतना क्यूँ किया। बाद इसके वह कभी छत पर तो कभी बरामदे पर मेरे पास आकर बैठ जाती और कभी मुझे देखती कभी मेरे पास रखी किताबों को। एक दिन मैं अपने कमरे में बिस्तर पर अधलेटा कोई किताब पढ़ रहा था। मेरी बेटी दौड़ती हुई मेरे ऊपर चढ़ गई और किताब पास की खिड़की पर टिका...