क्या होता अगर मैं उन बातों को लिख पाता. वे बातें जो तुम्हारे मेरे बीच कभी हुई नहीं. क्या होता ग़र हम कुछ दिनों और साथ रहते. क्या होता अगर हम कुछ देर और सेंट्रल पार्क में हाथ थामे टहलते और चूमने के लिए कोई कोना तलाशते. क्या होता अगर... पता नहीं क्या होता. एक कहानी लिखने के बारे में सोचना मुझे रोमांच से भर देता है. कैसे एक बीज में छुपा होता है एक पेड़? कैसे बूँद बूँद बारिश में छुपा होता है समंदर? कभी सोचा है तुमने? मैंने सोचा. इसलिए शब्दों से उगा ली कई सारी कहानियाँ. इन दिनों मैं हॉस्पिटल के चक्कर काट रहा हूँ. तरह-तरह के मरीजों को देखकर आभास होता है कि वक्त तेज़ी से बढ़ता जा रहा है मग़र जिंदगी ठहर सी गई है. एक तेज चुभन मेरी रीढ़ की हड्डी से होकर गुजर जाती है. हो सकता है तुम इसे मेरा कमीनापन कहो मग़र मुझे इसमें भी एक कहानी दिखाई देने लगती है. मैं खुद को इसी हॉस्पिटल के किसी बिस्तर पर दीवार का सहारा लिए बैठे देखता हूँ. मैं किस बीमारी के चलते यहाँ आया मुझे मालूम नहीं मग़र मैं इतना स्वस्थ हो चुका हूँ कि मेरे हाथ में मेरा लैपटॉप है और दिमाग़ में कई सारी कहानियाँ. मैं अक्सर सो...