Skip to main content

Posts

Showing posts with the label पापा

पता नहीं कैसे। ...

उसने कहा की कितना भी परेशां हो लो, एक दिन सब ठीक हो  ही जाता है। मैनी आधी मुस्कुरुहत के साथ उसे देखने लगा। मैंने सोचा की हाँ एक दिन सब ठीक हो जाता है मगर उसे ठीक करने वाला कोई होता है जिसे हम नहीं देख पाते।  अगले हफ्ते से लॉक डाउन खुलने की हर उम्मीद नाकाम रही। मैं अब उकता गया हूँ सारा घर अकेले सँभालते हुए। मुझे खीज होती है। मैं कहीं दीवार पे अपना सर फोड़ना चाहता हूँ मगर फिर याद आता है की गैस का सिलिंडर भरवाना है। मैं एटीएम के लिए घर से  निकल जाता हूँ। ऐसा नहीं है की पैसे नहीं है मगर अगले महीने की फिक्र है की अगर सब नार्मल नहीं हुआ तो बुरा फँसूँगा। मैं अपने भाई से पूछता हूँ की तू कहीं से जुगाड़ कर सकता है कुछ रुपये? वह मेरी तरफ होंठ दबाकर बेबसी से देखता है। मुझे उसमें मैं दिखाई देता हूँ। और मैं अपने आप को पापा की जगह पता हूँ। मुझे वे दिन यद् हो आते हैं जब पापा मुझसे पूछा करते थे की रोहन, तेरे पास थोड़े बहुत होंगे क्या ? और मैं अपनी किताबों के लालच में पैसे दबाये बिलकुल अपने छोटे भाई की तरह मुंह बनता था। यही सोचकर मैं भाई से कुछ नहीं कहता। मैं बस पापा से कहता हूँ की पता नहीं य...

एक अच्छा आदमी और एक अच्छी माँ

लड़का बीमार है। लड़की उसके माथे पर हाथ रख रख कर देखती है कि कितना बुखार है। लड़का खांसता है। लड़की पीठ पर हाथ फेरते हुए कहती है कि फ़िकर मत करना, एक दो दिन में बिलकुल पहले जैसे हो जाओगे। लड़के को उल्टियां होती है। लड़की बार बार वाशबेसिन साफ़ करती है। लड़का कहता है कुछ खाने का मन नहीं है। लड़की कहती है जो भी खाना हो बना दूँगी, बस थोड़ा सा खा लेना। लड़का कहता है दवाइयाँ शायद असरदार नहीं है। लड़की लाल मिर्च और झाड़ू से नजर उतार देती है।  इसी बीच पड़ोसी के एक दो लोग आकर कहते हैं कि ज्यादा पास मत जाया करो, ये बीमारी अच्छी नहीं है। लक्षण बुरे हैं कुछ भी हो सकता है। लड़की हाँ ह्म्म अच्छा कहती जाती है और उनके जाते ही लड़के के हाथ धोती है और उसे खाना देती है। इसी बीच लड़की बच्चों के लिए खाना बनाती है। इसी बीच लड़का सोचता है कि इस बार राशन का बिल कैसे भरा जाए। इसे लिखते हुए एक लड़का सीखता है कि पत्नी क्या होती है। इसे पढ़ते हुए एक लड़की सीखती है कि घर क्या होता है।  मैं सोचता हूँ कि बच्चों की परवरिश और पढ़ाई के बीच इन्हें कब आखिरी बार अपने लिए वक्त मिल पाया होगा? कब इन्होंन...

हैप्पी मदर्स डे

वह हर सुबह अनाउंस करती है कि चारों के चारों निकम्मे हो सोते ही रहते हो। उठो..! वर्ना सबको एक एक पड़ेगी। चारों में पापा भी शामिल होते हैं। उठ के चाय पीने के बाद हमें हर रोज़ पहली बार मालूम होता है कि हम इस धरती के सबसे गंदे जीव हैं क्यूँकि हमने अभी तक नहाया नहीं है। हम पापा से पूछते हैं कि मम्मी की डांट से कैसे बचें? पापा कहते हैं कि मैं ख़ुद इतने सालों से बचने का तरीका खोज रहा हूँ। मिलते ही बता दूँगा। कभी कभी लगता है कि हम चारों के जीवन का मकसद सिर्फ मम्मी से बचने के तरीके ढूँढना है। बाकि सरे काम तो साइड में यूँ ही होते रहते हैं। उसके बीमार होने पर जब हम दो भाई घर के काम करते हुए आपस में लड़ने लगते हैं की ये काम मैंने किया था अब ये वाला तू करेगा तो वह बीमारी भूल के हम दोनों को सलीके से याद दिलाती है कि दोनों सच में नालायक हो। हम मुस्कुराते हैं कि वह अपने नॉर्मल अवतार में आ गई है।  इन दिनों के सूनेपन में उसकी यह डांट ही हमें यह आभास दिलाती रहती है की दुनिया अब भी अपनी रफ़्तार से चल रही है। ♥️ दुनिया यूँ ही चलती रहे। वह हमेशा हमें डाँटती रहे। हैप्पी मदर्स डे। लव यू मॉम। *** नोबिता की म...