नदियाँ लौटने लगीं अपने उद्गम की ओर। हवा ठहर कर शांत हो गई। पेड़ बढ़ने की बजाय सिमट गए अपनी जड़ों में। समंदर उड़ गया ऊपर की ओर बारिश बन कर। और बूढ़े आदमी दौड़ने लगे एक गेंद के पीछे और बच्चे हो गए। सपना होगा शायद ये आज दोपहर का कोई। सच तो नहीं ही हो सकता। वर्ना तुम भी लौटकर चली आ रही होती मेरी तरफ़।