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Showing posts with the label शाम

हम जो चाहते हैं

ट्रैफिक में फंसी कार की तरह साँसे चलती हैं और ठहर जाती है। दिल धड़कता है फिर चुप हो जाता है। सुबह होती है। दिन ढ़ल जाता है। शाम दूर जाती किसी टैक्सी की तरह बुझती जाती है।  सड़क पर शोर बनते और बुझते हैं। बस की खिडकियों के शीशों से निकलती धुन एक सम्मोहन बाँधती हैं। मैं सड़क के किनारे बने तंबुओं को देखने लगता हूँ। एक कोई अधेड़ उम्र की महिला ईंटों का चूल्हा बनाकर रोटी सेंक रही है। अंदर बेड में कोई आदमी टीवी देखता लेटा हुआ है। वे बस में बैठे बैग लिए लोगों से कितने अलग हैं। उनके चेहरे पर कोई शिकायत नहीं है। जैसे कि वे जो चाहते थे उन्हें मिल गया हो। घर लौटने के इंतजार में घर आ जाता है। हम सड़क पर चलते हुए सोचते हैं कि किसी पुराने वक्त से टकरा जाएं। किसी से मिलने पर चाहने लगते हैं कि कुछ देर साथ ठहर कर बातें कर लें। और कभी किसी के साथ ठहरे हुए अचानक ऊब जाते हैं। असल में हम जो चाहते हैं वह हर पल घटित हो रहा है। हमने अपने ख्वाबों में जैसे जीवन के बीज बोए थे वे असल में खिल चुके हैं। जिस जीवन की हम कामना करते हैं असल में वह हमारे साथ ही चल रहा होता है। हम यह बात जानते भी हैं मग़र म...

बारिशें

कबूतर बैठ जाते हैं बिजली की तारों पर बच्चे दौड़ पड़ते हैं सड़कों पर छपाके मारते हुए बादल निकल पड़ते हैं शहर देखने  हवा की कमर में हाथ डाले और मैं बैठ जाता हूँ  अँगुलियों में कलम फंसाये और हाथों में डायरी लेकर।  कि सबका अपना अपना अंदाज़ होता है  बारिशों में भीगने का। 

फाटक

रेल्वे फाटक के सिग्नल की तरह दिल पता नहीं किसके इंतजार में खड़ा रहता है,  हसरतों की सड़क पर।  *** आजकल दिन चुपके से गुजर जाते हैं। शामें आहिस्ता से रात के पहलू में सिमट जाती हैं। मैं बस की पिछली सीट पर बैठा ये सोच रहा होता हूँ, कि हवा मेरे चेहरे पर लिखती जाती है कोई भीगा नग़मा। मैं आसमान में घर लौटते पंछियों से पूछता हूँ कि आज क्या जिया? कैसे पता करोगे कि ये दिन सिर्फ गुज़ारा भर है या जिया भी है? पेड़ से पत्ते गिरते हुए ठहर जाते हैं। पंछी चहक कर भूल जाते हैं अपनी चोंच बंद करना। ऑफिस की पास वाली गली में गुज़रते हुए मज़दूर फेंक देते हैं अपनी आधी बची सिगरेटों को। लड़कियां तोड़ देती हैं अपने बैग में छुपाया हुआ आईना। मैं ख़ुद से पूछता हूँ कि क्या बात है डियर, ये कैसे सवाल कर रहे हो? मन किसी डांट खाते बच्चे की तरह चुप खड़ा रहता है। दिल में कई हसरतें मुट्ठी से फिसलती रेत की तरह बिखर जाती हैं।  जब कोई जवाब नहीं मिलता तो मैं लिखने लगता हूँ ये छोटी छोटी बातें। एक झुंड पंछियों का शोर करता हुआ गुज़र जाता है शहर के ऊपर से। हसरतें। ख़्वाब। ज़िंदगी। शाम। तुम। 🤍 #poetry #ins...

क्या पहले बता देना चाहिए था?

मैं हर शाम बालकनी में आराम कुर्सी पर बैठा किताब पढ़ता। कहीं पास से कुछ चिडियों के बच्चों की आवाजें आती। एक रोज़ में किताब कुर्सी पर रखकर उन आवाजों का पीछा करने लगा। घर के पिछवाड़े में रखे कबाड़े पर एक पेड़ गिरकर टूट गया था शायद। उसमें से दो नन्हीं सुराहीदार गर्दन दिखाई दी। मैं अचम्भे से भर गया कि जीवन का कोई ढब नहीं है कि वह अनपेक्षित जगहों पर भी खिल उठता है।  मैंने उस घोंसले को उठाकर पास के पेड़ पर रख दिया। शाम को मम्मा बुलबुल बच्चों की आवाजों का पीछा करते हुए सीधे उस पेड़ पर पहुँच गई। या शायद उसने मुझे घोंसला वहां रखते हुए देख लिया हो। पता नहीं। अगली शाम मैं आदतन कुर्सी पर बैठा किताब पढ़ रहा था। मैंने देखा कि वह बुलबुल कपड़े सुखाने के तार पर आकर बैठ गई है। वह मुझे एकटक देखती रही जैसे पूछना चाहती हो कि तुमने मेरे लिए इतना क्यूँ किया। बाद इसके वह कभी छत पर तो कभी बरामदे पर मेरे पास आकर बैठ जाती और कभी मुझे देखती कभी मेरे पास रखी किताबों को। एक दिन मैं अपने कमरे में बिस्तर पर अधलेटा कोई किताब पढ़ रहा था। मेरी बेटी दौड़ती हुई मेरे ऊपर चढ़ गई और किताब पास की खिड़की पर टिका...

ठहर कर जीना

ठीक ठीक नहीं पता कि क्यूँ। मग़र शामें मुझे इंतजार से भरी ही लगती हैं। घर जाने के इंतजार में कैबिन के नीचे रखे जूते। घोंसले पर चिड़िया के आने के स्वागत में चोंच खोले बैठे चिड़िया के नन्हें बच्चे। पड़ोस से आती चाय की महक। बालकनी में खड़ी हर गुज़र को उम्मीद से देखती पत्नियाँ। जलने के इंतजार में चौराहे पर खड़ा एक लैम्पपोस्ट। कि कितना कुछ ठहरा हुआ है इंतजार में। मग़र हमें ऑफिस से भागते हुए घर जाने की इतनी जल्दी रहती है कि हम सामने से गुज़र रहे जीवन को देखना ही भूल जाते हैं। हमें सड़क के पहलू से उठती जाती धूप नहीं दिखती। हम देख ही नहीं पाते शहर के होंठो पर ठहरा हुआ किसी आने वाले का नाम। हम जीवन बनाने में इस कदर खोए होते हैं कि ठहर कर जीवन को महसूसना ही भूल जाते हैं। हमारी कहीं पहुँचने की चाहना हमें पास से गुज़रती आहटों के प्रति शून्य कर देती है।  कि क्या ही हो सकता है हमारा। मैं मग़र इस बाईपास के नीचे फ़ैले चबूतरे पर बैठ जाना चाहता हूँ। हर गुज़रते शख्स को पढ़ना चाहता हूँ कि किताबों से अब ऊब होने लगी है। रुकी हुई बसों की तस्वीर उतार लेना चाहता हूं कि जान सकूँ रुके हुए चलते जान...

हो जाने दो बरबाद

दिन का आखिरी पहर था ढल गया। रेहड़ी वालों ने शाम के स्वागत में  बिछा ली मूँगफलियाँ। एक भीड़ लोगों की बढ़ने लगी मार्केट की जानिब।   फेरी वालों ने दी आवाजें ग्राहकों को दूर से जैसे कोई पुकारे नाम महबूब का  सड़क के उस छोर से।  बादलों की एक शैतान टोली ने शहर पर डाल दी डकैत हवा ने फूँक मारकर बिछा दी चादर धूल की दूर दूर तक। लोग परेशान होकर लौटने लगे अपने अपने घरों को। मैं टैक्सी में बैठ जब ये देख रहा था तब मास्क के पीछे छुपी उसकी आँखों ने कहा कि मैं हवा हूँ और तुम बादल हो हो जाने दो बरबाद इस शहर को। 

यहां आओ

पाँच बजे हैं। घर जाने का वक्त हुआ है। सारा दिन ऑफिस में फ़ाइलें तह करते करते पिंडलियों में दर्द होने लगता है। थक जाती होगी तुम। यहाँ आओ, इस शाम को अपनी हथेली में रखकर तुम्हारा सर चम्पी कर दूँ। आराम आए थोड़ा सा तुम्हें। 

होने दो

ऑफ़िस में बैठे सोचते रहते कि ऐसा क्यूँ? किसी से बात करते तो लगता कि कब तक? किसी रोज़ उसके घुटनों पर सर रखकर रोने को जी चाहता। कभी सोचते कि उससे न मिलते तो अच्छा था।  मग़र क्या होता है?  हर घटना और चाहना के खिलने का अपना ढब है। एक रोज़ वह भी होता है जो हम नहीं चाहते। और जो चाहते हैं वह उम्र भर नहीं मिलता।  इसलिए ज्यादा सोचा मत करो। जो होना है सो होता है। होने दो।  गुड नाइट। 

जैसे लिखना

उसने कहा कि तुम हमेशा डरे हुए रहते हो। यह नहीं पता कि किससे। मग़र तुम रुके हुए भी चल रहे होते हो। इतना कहकर वह चली गई। मैं देर तक उसे जाते हुए देखता रहा।  तो क्या मैं अपने आप से ही भागता रहा उम्र भर? क्या सच में...मैं अपने को ख़ुद से अलग नहीं कर पाया हूँ?  इन दोनों में से मैं कौन हूँ?  शायद मुझे एक बार मुड़कर देखना था कि रेत के तूफ़ान के पार वो साया किसका है। तन्हाई के जंगल में ये पायल का शोर कैसा है।  मग़र मैं भागता रहा। मैं रुका होता तब भी असल में भाग रहा होता था। मेरा रुकना ऐसा था जैसे कोई अपनी कार का इंजन बंद किए बिना सड़क किनारे एक सिगरेट पीने ठहर गया हो। जैसे कोई मुसाफ़िर थक कर पेड़ की गोद में बैठ गया हो।  मग़र ये आराम नहीं था। ये असल में एक रुकी हुई दौड़ थी। ये दौड़ने से विराम था। जैसे कोई बंजारन रेत के समंदर में पानी तलाशने रुक गई हो।  आराम तब होता है जब हम छांव में बैठे सामने खड़ी धूप को देखें। जब हम किसी दोपहर अपना टास्क जल्दी ख़तम करके अपने साथ एक कप चाय पी सकें। जब एक गिलहरी अपने घर की खिड़की से ढलती शाम को देखकर अपने पंजों में फंसे ...

तुम नहीं समझोगे

ऑफिस में चारों तरफ़ से आता शोर जब अचानक बढ़ने लगता है तो वह एक संगीत रचने लगता है। इस संगीत को सुनते हुए लगने लगता है कि शीशे के पार शाम उतरने को है।  लोग अपना सामान समेटने लगते हैं। मैं डिस्कोर्ड में अपना वर्क-अपडेट डालकर पीसी ऑफ कर देता हूँ।  अचानक एक आवाज़ इस शोर को चीरती हुई कानों में उतरती है। मैं बाल्कनी में आ खड़ा होता हूँ। आसमान में ठहरी इस शाम को देखकर मैं एक सम्मोहन में खो जाता हूँ। जैसे कोई बच्चा मां का दुध पीते हुए दूर आसमान में देखते हुए कहीं खो जाता है।  शाम जैसे जादूगर की टोपी से निकला कोई अजूबा।  जैसे किसी अल्हड दोशीजा की नाज़ुक हथेलियों में लगी हुई कच्ची मेहँदी। जैसे उसकी हँसी से बिखरा हुआ कोई रंग।  जैसे एक दूजे में घुल गए हों मैं और तुम। ❤️ ***** वैसे, तुमने कभी सोचा है कि इस शाम में रंग कौन भरता है? कभी सोचा है कि एक बीज में कैसे छुपा होता है एक पेड़? मैंने सोचा। इसलिए शब्दों से उगा की कई सारी कविताएँ।  आज इनबॉक्स में कोई मैसेज नहीं रखा है। कॉल हिस्ट्री भी सूनी है। मैं सोचता हूँ कि किसी को ख़ुद ही याद कर लूं। किसी को पुकार कर ...

तुम बताओ

एक मुसाफिर जानता है  कि उसे कहाँ ठहरना है और कहाँ से कब चले जाना है एक टैक्सी वाले को मालूम है  कि किस मोड़ से इस शहर के बाहर जाकर भरा जा सकता है गिलास एक गिलहरी को भी इल्म है  कि पेड़ से गिरे बीज को कैसे कुतरना है पेड़ का पत्ता पत्ता जानता है  कि कब शाख से बिछड़ कर मिट्टी में मिल जाना है पंछी दिनभर काम करके  घर लौट कर करते हैं  अपनी चोंच साफ़  बादल अपनी आदत से मज़बूर  रोज बरसता है शहर पर,  थोड़ा थोड़ा  कि सब को मालूम है  अपने अपने ज़रूरी कामों के बारे में।  तुम बताओ,  तुम प्रेम के बारे में क्या जानते हो? 

एक रफ़ूगर

उसके बालों की किनारी पर कुछ सफ़ेद बाल आ चुके थे। उसके चेहरे पर सिलवटें उसकी ज़िन्दगी की व्यस्तताएं बयां कर रही थी।  वह एक नजर नीचे रखे डॉक्युमेंट्स को देखती फ़िर मेरे सामने एक सवाल रख देती। मैं लैपटॉप में लिखता जाता अपने हुनर का सबूत। ओके। मैं तुम्हें दो दिन बाद कॉल करुँगी। उसने लैपटॉप बंद करते हुए कहा। मैं एक कॉफी लेकर ऑफिस से बाहर निकल आया। हवा में बारिश के बाद की हल्की नमी घुली थी। जैसे उसकी आँखों में घुला था एक स्याह खालीपन। सड़क के किनारे इंतजार में खड़े चाय और सिगरेट के स्टॉल्स के आगे, ऑफिस के बाद मिले दोस्त बचे हुए दिन को धुएँ में उड़ा रहे थे। हवा के झोंकों पर चढ़ते हुए ऊपर उठता हुआ धुआं बादलों की शकल में आसमाँ पर छा गया। उफ़क़ पर नीम अँधेरा छाने लगा। शाम पेड़ों से होते हुए सड़क पर उतर आई।  बस स्टैंड से कुछ दूरी पर एक रफ़ूगर बैठा हुआ था। उसने एक गत्ते पर लाल स्कैच से लिख रखा था कि यहां पुराने कपड़े रफ़ू किए जाते हैं। काश कोई दुकान होती जहाँ हम बीते दिनों को तरतीब में लाकर ज़िन्दगी रफ़ू कर लेते। कितना कुछ उधड़ा पड़ा है।  मग़र...  सड़क पर चलते हुए इक...

सफ़ेद फूल के प्रिंट वाली कुर्ती

एक आहट फिर शाम की एक नग़मा फिर उसके नाम का कि जो कुछ भी है बस इतना ही है मेरे पास।  *** उस नीली अँगुलियों वाली लड़की के पास एक पिट्ठू बैग था। उसमें एक छोटा आईना और लिपस्टिक के साथ कुछ रंग भरे थे। अगले स्टेशन पर वह उतरने को खड़ी हुई तो एक हल्के धक्के से उसके बैग में रखे रंग बिखर गए।  उन रंगों के आपस में मिलने से आसमाँ के केनवास पर ये शाम खिल आई।  कभी मिलने के लिए तड़पते। कभी तड़प कर मिलते। तो कभी मिलकर फिर से मिलने के लिए। दिल को एक ढब चैन न आता। दिन बीतते गए। शामें किसी लंबी मेट्रो रेल की तरह शहर के ऊपर से गुज़रती रही। ज़िंदगी का कारवाँ चलता रहा।  हमने डीटीसी बसों में प्रेम किया। मेट्रो में बाहें डाले खड़े रहे। सड़क पर विदेशी जोड़ों की तरह रुक रुक कर कौने तलाशते रहे। हर पेड़, हर गली, हर मोड़ और हर वीकेंड को हमने अपने भीगे होठों से रंग दिया।  हम इश्क़ में शहर हो गए। हमने इस कदर इश्क़ किया। पर एक शहर भी किसी मोड़ पर ख़ुद से जुदा हो जाता है। जैसे बदरपुर बॉर्डर। जैसे मैं और तुम।  इन दिनों मेरे शहर में चाहतों का मौसम खिला है। दिल में बुझी हुई राख सुल...

तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी

एक तेज़ रफ़्तार गुज़रती ज़िंदगी असल में बहुत ठहरी हुई होती है।  ***** मेरे ऑफिस के ठीक सामने एक बस स्टैंड है। पर में हर शाम अगले स्टैंड तक चलते हुए जाना पसंद करता हूँ। यह मेरे लिए हर शाम दिनभर ऑफिस में काम के बाद एक तरह का जीवन को जीना है।  एक शाम से खूबसूरत कुछ नहीं होता। धीरे धीरे दूर से आती हुई, ख़ामोशी ओढ़े एक शाम।  शाम की यह ख़ामोशी असल में बहुत-सी आवाजों से मिलकर बनी होती है। सड़क किनारे खेलते हुए बच्चों का शोर, चाय-सिगरेट की दुकानों पर बैठे मजदूरों की बेपरवाह हँसी, कहीं दूर से गुज़रती हुई बस के हॉर्न का शोर, दूर कहीं से सुनाई पड़ता झींगुरों का उदास गीत, दिनभर काम के बाद थकी हुई, गोद में बच्चे लिए घर लौटती औरतों की बेबसी का शोर।  सब कुछ तेज़ रफ्तार से गुजरता हुआ मग़र कितना ठहरा हुआ। जैसे जिंदगी। 

तुम ❤️

मैं अपनी चेयर पर बैठा बाहर से आ रही ठंडी हवा को महसूस करता हूँ। दिन सामने खिड़की के काँच पर गिरते पानी की तरह फिसलता जाता है।  आहिस्ता आहिस्ता।  आँखों में नीम नींद भर आती है। बारिश के थमने तक ऑफिस की बाल्कनी पर शाम उतर आती है। बादलों की एक टीम आसमान में चलते चलते अचानक ठहर जाती है। जैसे कोई ऑफिस से घर जाती लड़की मार्केट में टंगे कपड़ों को देखकर ठहर जाती हैं।  बेवजह ही।  मैं अपना पीसी ऑफ करके मोबाईल चैक करता हूँ। उसमें किसी के उलाहने रखे हैं और रखी है एक रूठी हुई स्माइली। मैं मुस्कराता हूँ कि उसकी तल्खी से मौसम और भी दिलफरेब हो जाता है। मग़र।  उसको मुझसे शिकायत है कि मुझे ऑफिस से टाइम नहीं मिलता। मुझे उससे कहना है कि तुम्हारी याद से ही ये शाम खूबसूरत है।  तुम। ❤️

क्यूँ...

कभी कभी शाम का इंतजार दिन को बेहद लंबा कर देता है। हम ऑफिस के काम और जिंदगी के बीच बैलेंस बनाने की कशमकश में उलझे रहते हैं। हम थक जाते हैं। बेतहाशा। लगता है कि एक लंबी छुट्टी लेकर कहीं चले जाएं। मग़र यह नहीं सूझता कि कहां। कभी कभी।  एक शाम आकर सारी उलझनें बुहार देती है। घर लौटने की उम्मीद से शहर टिमटिमाने लगता है। बदन को सूकून आता है। मन गीत बुनने लगता है।  कि ये मौसम को अचानक क्या हो जाता है?  कभी कभी कोई इंतजार बेहद लंबा होता है। इतना कि हमें पता भी नहीं होता कि हम इंतजार में हैं। तुम अपने अंदर झाँकना और पूछना कि ये चुभन कैसी है? यूँ चुप चुप क्यूँ रहते हो, इस बैचैनी का सबब क्या है? मैं नहीं जान पाता कि मैं क्यूँ भटकता रहता हूँ एक कटी पतंग की तरह। शायद तुम जान पाओ।  दुआएँ। ❤️

पता नहीं क्यूँ...

कौन सी जा है जहाँ जल्वा-ए-माशूक़ नहीं  शौक़-ए-दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर  ~ अमीर मीनाई एक शाम एक चेहरा दिखा और प्यास बनकर गुज़र गया।                 ***** ऐसी ही किसी एक शाम की बात। किसी ने कहा कि ओके, कल दोपहर मिलते हैं। किसी ने कहा मैं घर पर ही कॉफी बना दूँगी। किसी ने कहा मन तो है मग़र मौका नहीं। किसी ने कहा सॉरी, फ़िर कभी। तो किसी ने कहा कि पागल हो क्या? घर पे मम्मी होती है। तुमने मग़र ऐसा कुछ नहीं कहा। तुम सिर्फ़ सड़क के उस पार से मुझे बार बार मुड़ कर देखती रही और खो गई अनचिन्हे चेहरों की भीड़ में।  अज़ीब बात है कि फ़िर भी सिर्फ़ तुम याद आई। क्यूँ?  पता नहीं। जाने दो।