उसने कहा कि तुम हमेशा डरे हुए रहते हो। यह नहीं पता कि किससे। मग़र तुम रुके हुए भी चल रहे होते हो। इतना कहकर वह चली गई। मैं देर तक उसे जाते हुए देखता रहा।
तो क्या मैं अपने आप से ही भागता रहा उम्र भर? क्या सच में...मैं अपने को ख़ुद से अलग नहीं कर पाया हूँ?
इन दोनों में से मैं कौन हूँ?
शायद मुझे एक बार मुड़कर देखना था कि रेत के तूफ़ान के पार वो साया किसका है। तन्हाई के जंगल में ये पायल का शोर कैसा है।
मग़र मैं भागता रहा। मैं रुका होता तब भी असल में भाग रहा होता था। मेरा रुकना ऐसा था जैसे कोई अपनी कार का इंजन बंद किए बिना सड़क किनारे एक सिगरेट पीने ठहर गया हो। जैसे कोई मुसाफ़िर थक कर पेड़ की गोद में बैठ गया हो।
मग़र ये आराम नहीं था। ये असल में एक रुकी हुई दौड़ थी। ये दौड़ने से विराम था। जैसे कोई बंजारन रेत के समंदर में पानी तलाशने रुक गई हो।
आराम तब होता है जब हम छांव में बैठे सामने खड़ी धूप को देखें। जब हम किसी दोपहर अपना टास्क जल्दी ख़तम करके अपने साथ एक कप चाय पी सकें।
जब एक गिलहरी अपने घर की खिड़की से ढलती शाम को देखकर अपने पंजों में फंसे अखरोट को कुतरना भूल जाए।
एक प्रेमी अपनी प्रेयसी को याद कर भीग जाए। एक ऑफिस से घर आई लड़की अपना जीन्स फेंककर ढ़ाल ले ख़ुद को हल्के सूट में।
कितनी व्यस्ततायें और कितने ही आराम। जैसे लिखना। ♥️
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