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तुम नहीं समझोगे

ऑफिस में चारों तरफ़ से आता शोर जब अचानक बढ़ने लगता है तो वह एक संगीत रचने लगता है। इस संगीत को सुनते हुए लगने लगता है कि शीशे के पार शाम उतरने को है।  लोग अपना सामान समेटने लगते हैं। मैं डिस्कोर्ड में अपना वर्क-अपडेट डालकर पीसी ऑफ कर देता हूँ।  अचानक एक आवाज़ इस शोर को चीरती हुई कानों में उतरती है। मैं बाल्कनी में आ खड़ा होता हूँ। आसमान में ठहरी इस शाम को देखकर मैं एक सम्मोहन में खो जाता हूँ। जैसे कोई बच्चा मां का दुध पीते हुए दूर आसमान में देखते हुए कहीं खो जाता है।  शाम जैसे जादूगर की टोपी से निकला कोई अजूबा।  जैसे किसी अल्हड दोशीजा की नाज़ुक हथेलियों में लगी हुई कच्ची मेहँदी। जैसे उसकी हँसी से बिखरा हुआ कोई रंग।  जैसे एक दूजे में घुल गए हों मैं और तुम। ❤️ ***** वैसे, तुमने कभी सोचा है कि इस शाम में रंग कौन भरता है? कभी सोचा है कि एक बीज में कैसे छुपा होता है एक पेड़? मैंने सोचा। इसलिए शब्दों से उगा की कई सारी कविताएँ।  आज इनबॉक्स में कोई मैसेज नहीं रखा है। कॉल हिस्ट्री भी सूनी है। मैं सोचता हूँ कि किसी को ख़ुद ही याद कर लूं। किसी को पुकार कर ...

तुम ❤️

मैं अपनी चेयर पर बैठा बाहर से आ रही ठंडी हवा को महसूस करता हूँ। दिन सामने खिड़की के काँच पर गिरते पानी की तरह फिसलता जाता है।  आहिस्ता आहिस्ता।  आँखों में नीम नींद भर आती है। बारिश के थमने तक ऑफिस की बाल्कनी पर शाम उतर आती है। बादलों की एक टीम आसमान में चलते चलते अचानक ठहर जाती है। जैसे कोई ऑफिस से घर जाती लड़की मार्केट में टंगे कपड़ों को देखकर ठहर जाती हैं।  बेवजह ही।  मैं अपना पीसी ऑफ करके मोबाईल चैक करता हूँ। उसमें किसी के उलाहने रखे हैं और रखी है एक रूठी हुई स्माइली। मैं मुस्कराता हूँ कि उसकी तल्खी से मौसम और भी दिलफरेब हो जाता है। मग़र।  उसको मुझसे शिकायत है कि मुझे ऑफिस से टाइम नहीं मिलता। मुझे उससे कहना है कि तुम्हारी याद से ही ये शाम खूबसूरत है।  तुम। ❤️