भरोसा नहीं होता कभी-कभी मुझे कि यह कविता मैंने लिखी है. कभी-कभी भरोसा नहीं होता कि इतवार की दोपहर में मेरे सीने पर तुम्हारे सिर की जगह किताब रखी हुई है. भरोसा नहीं होता कभी कभी कि सुबह हो गई है और मैं ज़िंदा हूँ. कभी कभी दिल करता है कि लिखूँ एक कविता सच्चे प्रेम के नाम पर, अब भरोसा नहीं होता.