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होंठो से मुझे देखो

तेरी यादों को छुपा लूँ अपने ब्लॉग्स के ड्राफ़्ट में भेज दूँ अपनी तन्हाई तुझे,  भरकर खाकी लिफाफे में लोग जब अपने घरों को लौटने लगते हैं जब दोपहर के वक्त पसरने लगती है उदासी तब न जाने ये कैसे खयाल आते हैं कंप्युटर, प्रिंटर, मेज़ सड़क से उड़ती रेत से ढंक जाते हैं  जैसे बीते लम्हों की याद से बचना नामुमकिन हो पर एक दिन जब मिलेंगे हम किसी बस की आखिरी सीट पर  टकरा जाएंगे किसी किस्से के दिलचस्प से इक मोड़ पर तब तुम मुझे याद दिलाना कि तुम से कोई बात कहनी है जिसे सुनकर तुम आँखों से मुस्कराओ और होंठो से मुझे देखो।

प्रेम...

छत पर मूँगफली के छिलके बिखरे पड़े हैं उन्हीं के बीच पड़े हैं कुछ दाने ठुकराए हुए से  जैसे कोई जरूरी कामों के बीच  भूल गया हो प्रेम को। *** वह दोनों सड़क के किनारे शायद किसी बस के इंतजार में खड़े थे। लड़की ने अपने कंधे पर एक बड़ा सा डफल बैग टांग रखा था। लड़के के दोनों हाथ जीन्स की जेब में थे। उसने अपनी शर्ट के पॉकेट से लाइटर निकाला और एक सिगरेट जला ली। लड़की की आँखें हवा के हर झोंके के साथ धुएँ से भर जाती। लड़का उसकी तरफ़ देखता तो वह मुस्कुरा देती। प्रेम भी पता नहीं क्या चीज़ होती है। कोई कर के पछताता। कोई ना करके।  *** दिल बेधड़क सुर बुनता जाता है। ज़िंदगी अपनी रफ़्तार से बीतती जाती है। दिन ऑफिस के कामों में कट जाता है। रात करवटें लेते गुजर जाती है। इसी बीच मुझे तुम्हें प्यार करना होता है। इन्हीं सब के बीच मैं तुम्हें याद करता हूँ। तुम्हारे लिए तोहफ़े सोचता हूँ, झुमके चुनता हूँ और पायलें लेता हूँ।  जरूरी नहीं कि जो दिन भर मैसेज न करता हो वह याद भी न करता हो।  समझा करो।  कि जिंदगी बिखरी हुई है और उसे बुहारने वाला लापता है। #Rohankidiary #poetry #...

तुम अपना ख्याल रखना

 हम जिस सिचुऐशन में होते हैं उसे ऑब्जर्व करना तो सरल है मगर लिखना कितना मुश्किल है न।  मैं सोचता हूँ कि होता तो कितना अच्छा होता कि मेरे पास मेरा एक क्लोन होता। मैं सोचता जाता और वह मेरे कमरे में बैठा हर बात को लैपटॉप पे लिखता जाता। पर मैं हर हालात को लिखना क्यूँ चाहता हूँ? क्या मैं लिखने का एडिक्ट हूँ?  यहाँ चारों तरफ़ मरीजों की भीड़ है। कोई रिसेप्शन पे अपने साथ आए मरीज़ का नाम बता रहा है तो कोई पूछ रहा है कि ये मेडिसन कौन से फ्लोर पर मिलेगी? मैं एक दीवार के सहारे खड़ा ये सब लिख रहा हूँ। क्यूँ लिख रहा हूँ ये मुझे भी नहीं पता। अचानक एक तेज और सुरीली आवाज़ आती है। वह ओपीडी के डॉक्टर के कक्ष के बाहर खड़ी किसी पैशेंट का नाम पुकार रही है। वह तीन चार बार आवाज़ लगाती है मगर उसे कोई रेस्पोंस नहीं मिलता। उसकी गहरी और तीखी आँखों पर फ्रस्ट्रेशन की लकीर उभरते लगती है। वह परेशान होकर और जोर से चिल्लाना चाहती है मगर एक बार चारों तरफ़ नजरें घुमाकर तुरंत अगली पर्ची का नाम पुकारने लगती है। शायद उसे आभास हुआ हो कि कोई उसे देख रहा हो और वह इस एक्स्प्रेशन अच्छी नहीं लग रही हो। शायद।  म...