हम जिस सिचुऐशन में होते हैं उसे ऑब्जर्व करना तो सरल है मगर लिखना कितना मुश्किल है न।
मैं सोचता हूँ कि होता तो कितना अच्छा होता कि मेरे पास मेरा एक क्लोन होता। मैं सोचता जाता और वह मेरे कमरे में बैठा हर बात को लैपटॉप पे लिखता जाता। पर मैं हर हालात को लिखना क्यूँ चाहता हूँ? क्या मैं लिखने का एडिक्ट हूँ?
यहाँ चारों तरफ़ मरीजों की भीड़ है। कोई रिसेप्शन पे अपने साथ आए मरीज़ का नाम बता रहा है तो कोई पूछ रहा है कि ये मेडिसन कौन से फ्लोर पर मिलेगी? मैं एक दीवार के सहारे खड़ा ये सब लिख रहा हूँ। क्यूँ लिख रहा हूँ ये मुझे भी नहीं पता। अचानक एक तेज और सुरीली आवाज़ आती है। वह ओपीडी के डॉक्टर के कक्ष के बाहर खड़ी किसी पैशेंट का नाम पुकार रही है। वह तीन चार बार आवाज़ लगाती है मगर उसे कोई रेस्पोंस नहीं मिलता। उसकी गहरी और तीखी आँखों पर फ्रस्ट्रेशन की लकीर उभरते लगती है। वह परेशान होकर और जोर से चिल्लाना चाहती है मगर एक बार चारों तरफ़ नजरें घुमाकर तुरंत अगली पर्ची का नाम पुकारने लगती है। शायद उसे आभास हुआ हो कि कोई उसे देख रहा हो और वह इस एक्स्प्रेशन अच्छी नहीं लग रही हो। शायद।
मैं एक बार चारों तरफ़ नजर दौड़ाता हूँ और देखता हूँ कि जिस उम्र के लड़कों और लड़कियों को अभी ऑफिस में होना चाहिए वे यहाँ अपने किसी पैरेंट के साथ लाइन में खड़े हैं। जिन लड़कों को होना चाहिए अपनी प्रेमिका के साथ किसी पार्क में और रूठना मनाना चाहिए अपने पार्टनर को, वे मना रहे हैं डॉक्टर को कि वे पापा को न बताएं कि उन्हें यह प्रॉब्लम है।
मैं काउन्टर की तरफ़ जाता हूँ। वह मुझे देखकर एक नर्वस स्माइल देती है और पूछती है कि कैसे हो? मैं कुछ देर सोचने लगता हूँ और कहता हूँ कि हाँ, ठीक हूँ। वह पर्ची थमाते हुए कहती है कि तुम झूठ अच्छा बोलते हो। अगर ठीक होते तो यहाँ थोड़ी न होते। मैं मुस्कुराता हूँ और अपने नंबर आने की प्रतीक्षा करने लाइन में लग जाता हूँ।
मुझे ये सब देखकर बहुत अजीब लग रहा है। इतना कि मैं यह सब लिखना नहीं चाहता। नहीं, मैं लिखने का एडिक्ट नहीं हूँ। मेरे लिए लिखना वैसा ही है जैसे बाकी दोस्तों का सिगरेट सुलगा लेना या चाय-कॉफी पी लेना।
मैं इस ख़त के बहाने उन लड़के लड़कियों से कहना चाहता हूँ कि मैं जानता हूँ कि तुमने सोचा था कि इस उम्र में आकर किसी के साथ ढेर सारा वक़्त बिताएंगे, किसी के हाथ को थामकर इस दुनिया को एक तीखी लात मारेंगे और कहीं किसी खूबसूरत जगह पर एक दूजे की बाहों में पड़े रहेंगे। मग़र वक्त खराब है। कोई बात नहीं, तुम अपनी जरूरी जिम्मेदारी निभा रहे हो ये बड़ी बात है। हाँ, किसी के बाहों में पड़े होने से भी बड़ी। मैं जानता हूँ कि मेरा ये कहना एक कोरी तसल्ली के सिवा कुछ भी नहीं मगर यकीन मानो कि ये जिम्मेदारियाँ तुम्हें एक अच्छा इंसान बनाने के लिए हैं।
ये सब अजीब वक्त चल रहा है। कुछ समझ नहीं आ रहा कि आगे क्या होगा मग़र मैं दवाई की लाइन में खड़ा ये सोच रहा हूँ कि किसी दिन तुमसे तुम्हारी छुट्टी के वक्त हॉस्पीटल के बाहर मिलूँ और तुमसे कहूँ कि टीवी अखबारों में हॉस्पीटल स्टाफ को लेकर काफ़ी खराब खबरें सुनने को मिल रही है, तुम अपना ख्याल रखना।
मैं इतने बुरे टाइम में भी तुमसे बेवजह की बातें करने के बारे में सोच रहा हूँ। मैं कितना बेकार आदमी हूँ न? शायद।
अपना ख्याल रखना।

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