मैं हर शाम बालकनी में आराम कुर्सी पर बैठा किताब पढ़ता। कहीं पास से कुछ चिडियों के बच्चों की आवाजें आती। एक रोज़ में किताब कुर्सी पर रखकर उन आवाजों का पीछा करने लगा। घर के पिछवाड़े में रखे कबाड़े पर एक पेड़ गिरकर टूट गया था शायद। उसमें से दो नन्हीं सुराहीदार गर्दन दिखाई दी। मैं अचम्भे से भर गया कि जीवन का कोई ढब नहीं है कि वह अनपेक्षित जगहों पर भी खिल उठता है। मैंने उस घोंसले को उठाकर पास के पेड़ पर रख दिया। शाम को मम्मा बुलबुल बच्चों की आवाजों का पीछा करते हुए सीधे उस पेड़ पर पहुँच गई। या शायद उसने मुझे घोंसला वहां रखते हुए देख लिया हो। पता नहीं। अगली शाम मैं आदतन कुर्सी पर बैठा किताब पढ़ रहा था। मैंने देखा कि वह बुलबुल कपड़े सुखाने के तार पर आकर बैठ गई है। वह मुझे एकटक देखती रही जैसे पूछना चाहती हो कि तुमने मेरे लिए इतना क्यूँ किया। बाद इसके वह कभी छत पर तो कभी बरामदे पर मेरे पास आकर बैठ जाती और कभी मुझे देखती कभी मेरे पास रखी किताबों को। एक दिन मैं अपने कमरे में बिस्तर पर अधलेटा कोई किताब पढ़ रहा था। मेरी बेटी दौड़ती हुई मेरे ऊपर चढ़ गई और किताब पास की खिड़की पर टिका...