Skip to main content

Posts

Showing posts from May, 2021

मैं भूल जाना चाहता हूँ

 ब्लू जीन्स और ओलिव ग्रीन टी शर्ट पहने हुए, हाथ में किताब लिए और बेख़याली की आँखों में झांकते हुए मैं भूल जाना चाहता हूँ, सब कुछ।  मैं भूल जाना चाहता हूँ अपने वॉलेट में रखी उसकी तस्वीर को, कल रात से चुप तांकते उसके खतों को, गुजर चुकी उस शाम को, उसकी छत को छूकर आती इस हवा को। सब कुछ।  खुद को भी।  तुम को भी।  सब कुछ। [ पेंटिंग - आर्ट यू। Art you ]

मुझे खुद भी नहीं पता..

 सुबह का वही डेली रूटीन। उठना नहाना कॉफी सफाई और किताब। मॉर्गन हौसल कहते  हैं की पेसिमिस्म इस सेडक्टिव। यानि निराशा ज्यादा लुभावनी होती है। अचानक चिंता शुरू होती है की आज मार्किट का क्या होगा। पैसे काम होंगे या बढ़ेंगे। इस महीने का किराया राशन क्या मुझे अकेले ही भरना पड़ेगा या कोई मदद आएगी फरिश्ता बनकर। काश आ जाये। लॉक डाउन जल्दी खुल जाये। कोरोना जल्दी भाग जाये। ऐसा हो तो कितना अच्छा हो। दिन उग आया है।  भाई बहन के साथ हंसी मजाक है। खाना है। मम्मी है। बातें हैं। मैं अंदर से चिंतित हूँ और विचलित भी। पर काम करता जाता हूँ। चाय आती है और फिर काम करने लग जाता हूँ।  एक दो मार्किट एनालिसिस के वीडियो देखता हूँ और कुछ सीखने का प्रयत्न करता हूँ की खुद का भविष्य सुधार सकूँ और दुनिया की रेस में भाग ले सकूँ। इसी बीच किसी के होंठ याद आते हैं। कोई चेहरा आहिस्ता से आँखों में उतरता है और मैं कहीं खो जाता हूँ। कुछ लिखने का मन होता है मगर दिमाग में काम भरा है। मैं आजकल शायद इस अवचेतन अवस्था में कैद हो गया हूँ। काम काम और सिर्फ काम।  शाम की बात।  लैपटॉप की दाहिने तरफ कॉफ़ी का मग र...

पता नहीं कैसे। ...

उसने कहा की कितना भी परेशां हो लो, एक दिन सब ठीक हो  ही जाता है। मैनी आधी मुस्कुरुहत के साथ उसे देखने लगा। मैंने सोचा की हाँ एक दिन सब ठीक हो जाता है मगर उसे ठीक करने वाला कोई होता है जिसे हम नहीं देख पाते।  अगले हफ्ते से लॉक डाउन खुलने की हर उम्मीद नाकाम रही। मैं अब उकता गया हूँ सारा घर अकेले सँभालते हुए। मुझे खीज होती है। मैं कहीं दीवार पे अपना सर फोड़ना चाहता हूँ मगर फिर याद आता है की गैस का सिलिंडर भरवाना है। मैं एटीएम के लिए घर से  निकल जाता हूँ। ऐसा नहीं है की पैसे नहीं है मगर अगले महीने की फिक्र है की अगर सब नार्मल नहीं हुआ तो बुरा फँसूँगा। मैं अपने भाई से पूछता हूँ की तू कहीं से जुगाड़ कर सकता है कुछ रुपये? वह मेरी तरफ होंठ दबाकर बेबसी से देखता है। मुझे उसमें मैं दिखाई देता हूँ। और मैं अपने आप को पापा की जगह पता हूँ। मुझे वे दिन यद् हो आते हैं जब पापा मुझसे पूछा करते थे की रोहन, तेरे पास थोड़े बहुत होंगे क्या ? और मैं अपनी किताबों के लालच में पैसे दबाये बिलकुल अपने छोटे भाई की तरह मुंह बनता था। यही सोचकर मैं भाई से कुछ नहीं कहता। मैं बस पापा से कहता हूँ की पता नहीं य...

वो लड़की

  उसके पीछे खड़ी दीवार पर एक लड़का और एक लड़की पेंटिंग में से झांक रहे थे। लड़की के बालों का रंग लाल था। लड़के की शर्ट का रंग नेवी ब्लू था। उसके हाथ में एक गिटार था। उसके बालों की लटें उसकी आँखों पर पहरा कर रही थी। उसने एक सफ़ेद काले रंग की शर्ट पहनी हुई थी। अचानक मुझे लगा जैसे उसने मुझे ये लिखते हुए देख लिया हो। पीछे से आवाज़ आई, दोस्त वह तुम्हें ही देख रही है। मैंने उसके पास जाकर साथ कॉफ़ी पर चलने को पूछा। उसने कहा एक शर्त पर। क्या तुम मेरी एक ऐसी तस्वीर उतार सकते हो जैसा तुमने मुझे इसमें लिखा है? 

एक अच्छा आदमी और एक अच्छी माँ

लड़का बीमार है। लड़की उसके माथे पर हाथ रख रख कर देखती है कि कितना बुखार है। लड़का खांसता है। लड़की पीठ पर हाथ फेरते हुए कहती है कि फ़िकर मत करना, एक दो दिन में बिलकुल पहले जैसे हो जाओगे। लड़के को उल्टियां होती है। लड़की बार बार वाशबेसिन साफ़ करती है। लड़का कहता है कुछ खाने का मन नहीं है। लड़की कहती है जो भी खाना हो बना दूँगी, बस थोड़ा सा खा लेना। लड़का कहता है दवाइयाँ शायद असरदार नहीं है। लड़की लाल मिर्च और झाड़ू से नजर उतार देती है।  इसी बीच पड़ोसी के एक दो लोग आकर कहते हैं कि ज्यादा पास मत जाया करो, ये बीमारी अच्छी नहीं है। लक्षण बुरे हैं कुछ भी हो सकता है। लड़की हाँ ह्म्म अच्छा कहती जाती है और उनके जाते ही लड़के के हाथ धोती है और उसे खाना देती है। इसी बीच लड़की बच्चों के लिए खाना बनाती है। इसी बीच लड़का सोचता है कि इस बार राशन का बिल कैसे भरा जाए। इसे लिखते हुए एक लड़का सीखता है कि पत्नी क्या होती है। इसे पढ़ते हुए एक लड़की सीखती है कि घर क्या होता है।  मैं सोचता हूँ कि बच्चों की परवरिश और पढ़ाई के बीच इन्हें कब आखिरी बार अपने लिए वक्त मिल पाया होगा? कब इन्होंन...

आँखों में पट्टी और एंजेल

  क्या मतलब हो सकता है? क्या ये दो लड़के किसी एंजेल को घायल करके ले जा रहे हैं पिंजरे में डालने? मगर उनके चेहरे और ले जाने के ढंग से तो ऐसा नहीं लगता। और बात रही आँख में बंधी पट्टी की तो वह चाहे तो फिर भी थोड़ी दूर ऊपर उड़कर उसे खोल कर उड़ सकती है और बच सकती है पिंजरे में डाले जाने से। पेंटिंग का रंग भी शांत है। लड़के ऐसे लग रहे हैं जैसे उन्हें कोई देख रहा हो। एंजेल हताश है। ये भी हो सकता है कि एंजेल लड़की घायल हो कर गिर पड़ी हो और उसके डैडी के  नौकर उसे महल वापस ले जा रहे हों। पर  आँखों में पट्टी क्यों?? क्या हो सकता है? क्या मतलब हो सकता है आखिर?

पता नहीं क्यूँ...

कौन सी जा है जहाँ जल्वा-ए-माशूक़ नहीं  शौक़-ए-दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर  ~ अमीर मीनाई एक शाम एक चेहरा दिखा और प्यास बनकर गुज़र गया।                 ***** ऐसी ही किसी एक शाम की बात। किसी ने कहा कि ओके, कल दोपहर मिलते हैं। किसी ने कहा मैं घर पर ही कॉफी बना दूँगी। किसी ने कहा मन तो है मग़र मौका नहीं। किसी ने कहा सॉरी, फ़िर कभी। तो किसी ने कहा कि पागल हो क्या? घर पे मम्मी होती है। तुमने मग़र ऐसा कुछ नहीं कहा। तुम सिर्फ़ सड़क के उस पार से मुझे बार बार मुड़ कर देखती रही और खो गई अनचिन्हे चेहरों की भीड़ में।  अज़ीब बात है कि फ़िर भी सिर्फ़ तुम याद आई। क्यूँ?  पता नहीं। जाने दो। 

हैप्पी मदर्स डे

वह हर सुबह अनाउंस करती है कि चारों के चारों निकम्मे हो सोते ही रहते हो। उठो..! वर्ना सबको एक एक पड़ेगी। चारों में पापा भी शामिल होते हैं। उठ के चाय पीने के बाद हमें हर रोज़ पहली बार मालूम होता है कि हम इस धरती के सबसे गंदे जीव हैं क्यूँकि हमने अभी तक नहाया नहीं है। हम पापा से पूछते हैं कि मम्मी की डांट से कैसे बचें? पापा कहते हैं कि मैं ख़ुद इतने सालों से बचने का तरीका खोज रहा हूँ। मिलते ही बता दूँगा। कभी कभी लगता है कि हम चारों के जीवन का मकसद सिर्फ मम्मी से बचने के तरीके ढूँढना है। बाकि सरे काम तो साइड में यूँ ही होते रहते हैं। उसके बीमार होने पर जब हम दो भाई घर के काम करते हुए आपस में लड़ने लगते हैं की ये काम मैंने किया था अब ये वाला तू करेगा तो वह बीमारी भूल के हम दोनों को सलीके से याद दिलाती है कि दोनों सच में नालायक हो। हम मुस्कुराते हैं कि वह अपने नॉर्मल अवतार में आ गई है।  इन दिनों के सूनेपन में उसकी यह डांट ही हमें यह आभास दिलाती रहती है की दुनिया अब भी अपनी रफ़्तार से चल रही है। ♥️ दुनिया यूँ ही चलती रहे। वह हमेशा हमें डाँटती रहे। हैप्पी मदर्स डे। लव यू मॉम। *** नोबिता की म...

ये कोई कम बुरी बात नहीं है

  मैं इस दुनिया से बेफिकर, तुम्हारे और मेरे प्रेम के बारे में लिखने वाला आदमी हूँ। मैं सोचता हूँ कि दो प्रेम करते पंछियों के जरिए तुम्हारी और मेरी बातें लिखता ही रहूँ मग़र इन दिनों ऐसा कुछ करने का मन नहीं है। हाथ लिखने को उठते हैं मग़र आजकल दिल में ज़ज्बात नहीं है।  ये कोई कम बुरी बात नहीं है। क्या हुआ है?

फ़िलहाल और कुछ नहीं चाहिए

  रात के एक बजे हैं। लगभग सारा शहर सो चुका है। मैं छत पर खड़ा अपने स्टिलनेस को पुकार रहा हूँ। मैं उससे पूछता हूँ कि क्या बदला है? वह इस रात की तरह खामोश है।  बादलों में से चाँद झाँकने लगता है।  मैं उससे कहता हूँ कि तुम रहो, दुनिया चलती रहे और मैं लिखता रहूँ कि मुझे फ़िलहाल कुछ और नहीं चाहिए।  तुम्हारी बात अलग है।