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Showing posts from November, 2021

नियति

खिड़की से हवा का एक झोंका आता। डेस्क पर रेत पसरती जाती। किताबों के पन्ने कुछ पल कांपते और ठहर जाते। जैसे कोई थका हुआ मजदूर गहरी नींद से अचानक उठ गया हो और फिर से सो गया हो। काम करते अचानक जब ऊब होने लगती तो आँखें कौने कौने को ऑब्जर्व करने लगती। ऊपर लगी खिड़की से आती रोशनी की परछाई में एक मकड़ी ने जाल बुना है। एक मकोड़ा कुछ देर उस जाल में फंसा छटपटाता है और फिर आहिस्ता आहिस्ता दम तोड़ देता है। जैसा कि एक रोज़ लालच से उपजे प्रेम का हाल होता है। मैं अपने कैबिन से बाहर आ जाता हूँ। टहलते हुए अचानक उलझन में खो जाता हूँ कि मकोड़े के हाल पर आश्चर्य किया जाए या दुःखी हुआ जाए। ऐसा सोचते मैं अचानक एक मकोड़े में बदल जाता हूँ और धूल भरी सड़क पर रेंगने लगता हूँ। चलते हुए अचानक पाता हूँ कि आगे किसी ने जाल बिछाया हुआ है। मैं कुछ पल को ठहर जाता हूँ। अचानक ख्याल आता है कि सबकी अपनी नियति होती है कि जिसे जहाँ जाना होता है वह उसी तरफ़ जाता है।  हो सकता है कि उसके जाल में फंसना ही मेरी नियति हो। दूर से चमकती उसकी आँखें रेगिस्तान में पानी के भ्रम के जैसी थी। मैं अपने हाल पर मुस्कराता हूँ और ...

ऑफिस जिंदगी

कभी काम में घंटों व्यस्त रहते। कभी अचानक बैचैन होकर कुर्सी से उठ जाते और सोचते कि जिंदगी क्या शै है? क्या यूँ ही ऑफिस आते जाते, दोस्तों से मिलते और ऑफिस का काम करते हुए मर जाएंगे? जिदंगी मग़र कोई रिप्लाई नहीं देती। बस किसी पेड़ की डाल पर अलसाये पड़े उदबिलाव की तरह तकती जाती है। किसी दोस्तों ने कारोबार जमाया। दो एक ने शादी की। मैं उनके जश्न में पीता हुआ सोचता रहा कि क्या ये आगे बढ़ रहे हैं और मैं पीछे रह गया हूँ? अचानक एक दो मैसेज टाइप करता हूँ कि 'तुमसे प्यार है। मिलो।' जिंदगी की तरह मग़र वहाँ से भी कोई जवाब नहीं आता।  दिन गुज़रते जाते हैं। काम बढ़ता जाता है। मैं कम होता जाता हूँ। मिट जाने के डर से मुक्ति पाने के लिए लिखने लगता हूँ। तुम्हें पता है रोहन, सब कुछ अपनी गति से आगे बढ़ रहा है। कोई भी और कुछ भी आगे या पीछे नहीं होता। जिस फूल को डाल से गिरने में मौसम लग जाते हैं वही फूल हवा के एक झोंके से मिट्टी की बाहों में समा जाता है।  ज्यादा सोचा मत करो। समझे?  चियर्स। लव यू। 

होंठो से मुझे देखो

तेरी यादों को छुपा लूँ अपने ब्लॉग्स के ड्राफ़्ट में भेज दूँ अपनी तन्हाई तुझे,  भरकर खाकी लिफाफे में लोग जब अपने घरों को लौटने लगते हैं जब दोपहर के वक्त पसरने लगती है उदासी तब न जाने ये कैसे खयाल आते हैं कंप्युटर, प्रिंटर, मेज़ सड़क से उड़ती रेत से ढंक जाते हैं  जैसे बीते लम्हों की याद से बचना नामुमकिन हो पर एक दिन जब मिलेंगे हम किसी बस की आखिरी सीट पर  टकरा जाएंगे किसी किस्से के दिलचस्प से इक मोड़ पर तब तुम मुझे याद दिलाना कि तुम से कोई बात कहनी है जिसे सुनकर तुम आँखों से मुस्कराओ और होंठो से मुझे देखो।