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ऑफिस जिंदगी

कभी काम में घंटों व्यस्त रहते। कभी अचानक बैचैन होकर कुर्सी से उठ जाते और सोचते कि जिंदगी क्या शै है? क्या यूँ ही ऑफिस आते जाते, दोस्तों से मिलते और ऑफिस का काम करते हुए मर जाएंगे? जिदंगी मग़र कोई रिप्लाई नहीं देती। बस किसी पेड़ की डाल पर अलसाये पड़े उदबिलाव की तरह तकती जाती है।
किसी दोस्तों ने कारोबार जमाया। दो एक ने शादी की। मैं उनके जश्न में पीता हुआ सोचता रहा कि क्या ये आगे बढ़ रहे हैं और मैं पीछे रह गया हूँ? अचानक एक दो मैसेज टाइप करता हूँ कि 'तुमसे प्यार है। मिलो।' जिंदगी की तरह मग़र वहाँ से भी कोई जवाब नहीं आता। 

दिन गुज़रते जाते हैं। काम बढ़ता जाता है। मैं कम होता जाता हूँ। मिट जाने के डर से मुक्ति पाने के लिए लिखने लगता हूँ।

तुम्हें पता है रोहन, सब कुछ अपनी गति से आगे बढ़ रहा है। कोई भी और कुछ भी आगे या पीछे नहीं होता। जिस फूल को डाल से गिरने में मौसम लग जाते हैं वही फूल हवा के एक झोंके से मिट्टी की बाहों में समा जाता है। 

ज्यादा सोचा मत करो। समझे? 

चियर्स। लव यू। 

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हो सकता है

 मौसम विभाग ने कहा था की दस तारिख को बारिश होगी  उसने कहा था की दस तारीख को मिलेंगे  न बारिश हुई न वह मिलने आई।  हो सकता है इन दो बातों का एक दूजे से कोई लेना देना न हो। 

जैसे...

वॉयलिन की कोई उदास धुन बजाते हुए, जैसे मर गया हो कोई संगीतकार। जैसे कोई बूढ़ा ठहर गया हो अपनी आखिरी खुराक खाने से पहले ही। जैसे मुस्कराते हुए हिरन की गर्दन काट दी हो शिकारी ने और वह भूल गया हो आखिरी तड़प के दर्द को चेहरे पर लाना।  जैसे पुकारा हो तुमने मेरा नाम आखिरी बार जैसे मैं कर रहा हूँ इंतजार तुमसे मिलने का,  आखिरी बार।

ख़यालों के कुछ टुकड़े

एक मजदूर प्रेमी अपने महीने भर की तनख्वाह से अपनी महबूबा के लिए एक चाँद लाया. और महबूबा चाँद पर बैठकर किसी शहजादे के पास चली गई. *** किताबें इंसान को बिना पिए ही शराबी बना देती है। *** कभी कभी मैं महसूस करता हूँ कि मैं सर्द हवा का एक झोंका हूँ. जो हर सुबह एक नीली तितली की पीठ पर बैठकर अपने काम पर जाता है. और शाम को लौटता है एक बादल बनकर. *** ऑफिस का घर से दूर होना कितना मजेदार है! 2 घंटे की भीड़ भरी तन्हाई में कितना कुछ लिखा जा सकता है। *** इस दुनिया में हर चीज एक करिश्मा है. यह करिश्मा ही है कि मैं ऑफिस में कीबोर्ड पर टिक टिक करते वक़्त यह महसूस करता हूँ कि मैं अपनी अपनी प्रेमिका को ख़त लिख रहा हूँ. ख़त, जो हर शाम अधूरा रह जाता है. ***