कभी काम में घंटों व्यस्त रहते। कभी अचानक बैचैन होकर कुर्सी से उठ जाते और सोचते कि जिंदगी क्या शै है? क्या यूँ ही ऑफिस आते जाते, दोस्तों से मिलते और ऑफिस का काम करते हुए मर जाएंगे? जिदंगी मग़र कोई रिप्लाई नहीं देती। बस किसी पेड़ की डाल पर अलसाये पड़े उदबिलाव की तरह तकती जाती है।
किसी दोस्तों ने कारोबार जमाया। दो एक ने शादी की। मैं उनके जश्न में पीता हुआ सोचता रहा कि क्या ये आगे बढ़ रहे हैं और मैं पीछे रह गया हूँ? अचानक एक दो मैसेज टाइप करता हूँ कि 'तुमसे प्यार है। मिलो।' जिंदगी की तरह मग़र वहाँ से भी कोई जवाब नहीं आता।
दिन गुज़रते जाते हैं। काम बढ़ता जाता है। मैं कम होता जाता हूँ। मिट जाने के डर से मुक्ति पाने के लिए लिखने लगता हूँ।
तुम्हें पता है रोहन, सब कुछ अपनी गति से आगे बढ़ रहा है। कोई भी और कुछ भी आगे या पीछे नहीं होता। जिस फूल को डाल से गिरने में मौसम लग जाते हैं वही फूल हवा के एक झोंके से मिट्टी की बाहों में समा जाता है।
ज्यादा सोचा मत करो। समझे?
चियर्स। लव यू।
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