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Showing posts from September, 2021

कब...

खिड़की से हवा का झोंका रह रह कर आता। वह हर झोंके पर खिड़की के पल्लू को तह करता। ब्रश से स्ट्रोक तो इतने अच्छे लगा रहा था कि जैसे अपने अतीत को रंग रहा हो। मुझे तो जानबूझकर भटका हुआ रेल का कोई डिब्बा लगता है वो।  खिड़की पर ब्रश से स्ट्रोक मारते मारते पता नहीं किसके ख्यालों में खो जाता है। हर बार जब ब्रश कलर की छोटी बाल्टी में डुबोता है, होंठ गोल करके पता नहीं कौन सी नज़्म प्ले करता है ये। खिड़की के पार छत पर कोई काजल का पर्दा भी नहीं है कि जिसके पार वह अपने होंठों की धुन पहुँचाना चाहता हो। मुझे तो सच में, बड़ा अज़ीब लड़का लग रहा है।  पंखा बंद कर रखा है इतनी गर्मी में। कहता है पसीना न आए तो लगता ही नहीं कि दिन बीत रहा है। अपने माथे पर आए हर पसीने की बूँद को अँगुलियों से इतनी नफ़ासत से संभाल कर ख़र्च करता है जैसे यही उसकी कमाई हो। शायद है भी।  जब उसे कहा गया कि काम छोड़ो और चाय पी लो, तो इतनी ख़ुशी ख़ुशी सारा काम फ़ेंक कर बैठ गया जैसे किसी बच्चे को कह दो कि काम बंद करो तो वह अपनी पेंसिल और नोटबुक एक तरफ़ फ़ेंक देता है। कितना बचपना है इसमें। प्रोफ़ेसनालिटी नाम की त...

होने दो

ऑफ़िस में बैठे सोचते रहते कि ऐसा क्यूँ? किसी से बात करते तो लगता कि कब तक? किसी रोज़ उसके घुटनों पर सर रखकर रोने को जी चाहता। कभी सोचते कि उससे न मिलते तो अच्छा था।  मग़र क्या होता है?  हर घटना और चाहना के खिलने का अपना ढब है। एक रोज़ वह भी होता है जो हम नहीं चाहते। और जो चाहते हैं वह उम्र भर नहीं मिलता।  इसलिए ज्यादा सोचा मत करो। जो होना है सो होता है। होने दो।  गुड नाइट। 

जैसे लिखना

उसने कहा कि तुम हमेशा डरे हुए रहते हो। यह नहीं पता कि किससे। मग़र तुम रुके हुए भी चल रहे होते हो। इतना कहकर वह चली गई। मैं देर तक उसे जाते हुए देखता रहा।  तो क्या मैं अपने आप से ही भागता रहा उम्र भर? क्या सच में...मैं अपने को ख़ुद से अलग नहीं कर पाया हूँ?  इन दोनों में से मैं कौन हूँ?  शायद मुझे एक बार मुड़कर देखना था कि रेत के तूफ़ान के पार वो साया किसका है। तन्हाई के जंगल में ये पायल का शोर कैसा है।  मग़र मैं भागता रहा। मैं रुका होता तब भी असल में भाग रहा होता था। मेरा रुकना ऐसा था जैसे कोई अपनी कार का इंजन बंद किए बिना सड़क किनारे एक सिगरेट पीने ठहर गया हो। जैसे कोई मुसाफ़िर थक कर पेड़ की गोद में बैठ गया हो।  मग़र ये आराम नहीं था। ये असल में एक रुकी हुई दौड़ थी। ये दौड़ने से विराम था। जैसे कोई बंजारन रेत के समंदर में पानी तलाशने रुक गई हो।  आराम तब होता है जब हम छांव में बैठे सामने खड़ी धूप को देखें। जब हम किसी दोपहर अपना टास्क जल्दी ख़तम करके अपने साथ एक कप चाय पी सकें। जब एक गिलहरी अपने घर की खिड़की से ढलती शाम को देखकर अपने पंजों में फंसे ...

हो सकता है

 मौसम विभाग ने कहा था की दस तारिख को बारिश होगी  उसने कहा था की दस तारीख को मिलेंगे  न बारिश हुई न वह मिलने आई।  हो सकता है इन दो बातों का एक दूजे से कोई लेना देना न हो। 

तुम बताओ?

एक मुसाफिर जानता है  कि उसे कहाँ ठहरना है और कहाँ से कब चले जाना है एक टैक्सी वाले को मालूम है  कि किस मोड़ से इस शहर के बाहर जाकर भरा जा सकता है गिलास एक गिलहरी को भी इल्म है  कि पेड़ से गिरे बीज को कैसे कुतरना है पेड़ का पत्ता पत्ता जानता है  कि कब शाख से बिछड़ कर मिट्टी में मिल जाना है पंछी दिनभर काम करके  घर लौट कर करते हैं  अपनी चोंच साफ़  बादल अपनी आदत से मज़बूर  रोज बरसता है शहर पर,  थोड़ा थोड़ा  कि सब को मालूम है  अपने अपने ज़रूरी कामों के बारे में।  तुम बताओ,  तुम प्रेम के बारे में क्या जानते हो?

तुम नहीं समझोगे

ऑफिस में चारों तरफ़ से आता शोर जब अचानक बढ़ने लगता है तो वह एक संगीत रचने लगता है। इस संगीत को सुनते हुए लगने लगता है कि शीशे के पार शाम उतरने को है।  लोग अपना सामान समेटने लगते हैं। मैं डिस्कोर्ड में अपना वर्क-अपडेट डालकर पीसी ऑफ कर देता हूँ।  अचानक एक आवाज़ इस शोर को चीरती हुई कानों में उतरती है। मैं बाल्कनी में आ खड़ा होता हूँ। आसमान में ठहरी इस शाम को देखकर मैं एक सम्मोहन में खो जाता हूँ। जैसे कोई बच्चा मां का दुध पीते हुए दूर आसमान में देखते हुए कहीं खो जाता है।  शाम जैसे जादूगर की टोपी से निकला कोई अजूबा।  जैसे किसी अल्हड दोशीजा की नाज़ुक हथेलियों में लगी हुई कच्ची मेहँदी। जैसे उसकी हँसी से बिखरा हुआ कोई रंग।  जैसे एक दूजे में घुल गए हों मैं और तुम। ❤️ ***** वैसे, तुमने कभी सोचा है कि इस शाम में रंग कौन भरता है? कभी सोचा है कि एक बीज में कैसे छुपा होता है एक पेड़? मैंने सोचा। इसलिए शब्दों से उगा की कई सारी कविताएँ।  आज इनबॉक्स में कोई मैसेज नहीं रखा है। कॉल हिस्ट्री भी सूनी है। मैं सोचता हूँ कि किसी को ख़ुद ही याद कर लूं। किसी को पुकार कर ...

ये कशिश कैसी थी?

अचानक कोई आवाज़ सुनाई पड़ती है। जैसे कुछ टूटकर गिर बिखर गया हो। मैं इधर उधर देखने लगता हूँ। सबकुछ वैसे ही है जैसे पहले था। फ़िर ये आवाज कैसी थी? मैं ख़ुद को अपनी चेयर पर छोड़कर ऑफिस से बाहर आ जाता हूँ। दोनों हाथों से अपनी जेबों को टटोलता हूँ। दो बार टक टक की आवाज के बाद सिगरेट सुलगने लगती है। एक अजीब सा हल्कापन दिमाग़ पर तारी हो जाता है। मैं रुई के फाहे सा हल्का हो जाता हूँ।  सड़क पर धूप का आईना फ़ैला हुआ है। एक लड़का एक लड़की को मना रहा है। लड़की बार बार हाथ छिटक कर आगे बढ़ जाती है।  वह उन्हें देखकर मुस्कराती है।  मैं एक लंबा कश लेकर सिगरेट उसकी तरफ़ बढ़ा देता हूँ। वह अपनी दो अँगुलियों के बीच सिगरेट फंसाती है और अपने होठों पर रखकर एक क्विक कश लेती है। मैं उसके हाथों से सिगरेट लेते हुए ठिठक जाता हूँ। फिल्टर पर उसके होठों की छुअन को अपनी अँगुलियों में महसूस करता हूँ। अगला कश लेने के लिए उसे अपने होठों से लगाता हूँ।  आहा! ये किस चीज़ को किस चीज़ से मिला रहा हूँ मैं!  अचानक कोई साया ऑफिस से बाहर की तरफ़ आता दिखता है। हम दोनों आखिरी बार एक दूसरे को देखकर...

तुम बताओ

एक मुसाफिर जानता है  कि उसे कहाँ ठहरना है और कहाँ से कब चले जाना है एक टैक्सी वाले को मालूम है  कि किस मोड़ से इस शहर के बाहर जाकर भरा जा सकता है गिलास एक गिलहरी को भी इल्म है  कि पेड़ से गिरे बीज को कैसे कुतरना है पेड़ का पत्ता पत्ता जानता है  कि कब शाख से बिछड़ कर मिट्टी में मिल जाना है पंछी दिनभर काम करके  घर लौट कर करते हैं  अपनी चोंच साफ़  बादल अपनी आदत से मज़बूर  रोज बरसता है शहर पर,  थोड़ा थोड़ा  कि सब को मालूम है  अपने अपने ज़रूरी कामों के बारे में।  तुम बताओ,  तुम प्रेम के बारे में क्या जानते हो? 

एक रफ़ूगर

उसके बालों की किनारी पर कुछ सफ़ेद बाल आ चुके थे। उसके चेहरे पर सिलवटें उसकी ज़िन्दगी की व्यस्तताएं बयां कर रही थी।  वह एक नजर नीचे रखे डॉक्युमेंट्स को देखती फ़िर मेरे सामने एक सवाल रख देती। मैं लैपटॉप में लिखता जाता अपने हुनर का सबूत। ओके। मैं तुम्हें दो दिन बाद कॉल करुँगी। उसने लैपटॉप बंद करते हुए कहा। मैं एक कॉफी लेकर ऑफिस से बाहर निकल आया। हवा में बारिश के बाद की हल्की नमी घुली थी। जैसे उसकी आँखों में घुला था एक स्याह खालीपन। सड़क के किनारे इंतजार में खड़े चाय और सिगरेट के स्टॉल्स के आगे, ऑफिस के बाद मिले दोस्त बचे हुए दिन को धुएँ में उड़ा रहे थे। हवा के झोंकों पर चढ़ते हुए ऊपर उठता हुआ धुआं बादलों की शकल में आसमाँ पर छा गया। उफ़क़ पर नीम अँधेरा छाने लगा। शाम पेड़ों से होते हुए सड़क पर उतर आई।  बस स्टैंड से कुछ दूरी पर एक रफ़ूगर बैठा हुआ था। उसने एक गत्ते पर लाल स्कैच से लिख रखा था कि यहां पुराने कपड़े रफ़ू किए जाते हैं। काश कोई दुकान होती जहाँ हम बीते दिनों को तरतीब में लाकर ज़िन्दगी रफ़ू कर लेते। कितना कुछ उधड़ा पड़ा है।  मग़र...  सड़क पर चलते हुए इक...

सफ़ेद फूल के प्रिंट वाली कुर्ती

एक आहट फिर शाम की एक नग़मा फिर उसके नाम का कि जो कुछ भी है बस इतना ही है मेरे पास।  *** उस नीली अँगुलियों वाली लड़की के पास एक पिट्ठू बैग था। उसमें एक छोटा आईना और लिपस्टिक के साथ कुछ रंग भरे थे। अगले स्टेशन पर वह उतरने को खड़ी हुई तो एक हल्के धक्के से उसके बैग में रखे रंग बिखर गए।  उन रंगों के आपस में मिलने से आसमाँ के केनवास पर ये शाम खिल आई।  कभी मिलने के लिए तड़पते। कभी तड़प कर मिलते। तो कभी मिलकर फिर से मिलने के लिए। दिल को एक ढब चैन न आता। दिन बीतते गए। शामें किसी लंबी मेट्रो रेल की तरह शहर के ऊपर से गुज़रती रही। ज़िंदगी का कारवाँ चलता रहा।  हमने डीटीसी बसों में प्रेम किया। मेट्रो में बाहें डाले खड़े रहे। सड़क पर विदेशी जोड़ों की तरह रुक रुक कर कौने तलाशते रहे। हर पेड़, हर गली, हर मोड़ और हर वीकेंड को हमने अपने भीगे होठों से रंग दिया।  हम इश्क़ में शहर हो गए। हमने इस कदर इश्क़ किया। पर एक शहर भी किसी मोड़ पर ख़ुद से जुदा हो जाता है। जैसे बदरपुर बॉर्डर। जैसे मैं और तुम।  इन दिनों मेरे शहर में चाहतों का मौसम खिला है। दिल में बुझी हुई राख सुल...

तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी

एक तेज़ रफ़्तार गुज़रती ज़िंदगी असल में बहुत ठहरी हुई होती है।  ***** मेरे ऑफिस के ठीक सामने एक बस स्टैंड है। पर में हर शाम अगले स्टैंड तक चलते हुए जाना पसंद करता हूँ। यह मेरे लिए हर शाम दिनभर ऑफिस में काम के बाद एक तरह का जीवन को जीना है।  एक शाम से खूबसूरत कुछ नहीं होता। धीरे धीरे दूर से आती हुई, ख़ामोशी ओढ़े एक शाम।  शाम की यह ख़ामोशी असल में बहुत-सी आवाजों से मिलकर बनी होती है। सड़क किनारे खेलते हुए बच्चों का शोर, चाय-सिगरेट की दुकानों पर बैठे मजदूरों की बेपरवाह हँसी, कहीं दूर से गुज़रती हुई बस के हॉर्न का शोर, दूर कहीं से सुनाई पड़ता झींगुरों का उदास गीत, दिनभर काम के बाद थकी हुई, गोद में बच्चे लिए घर लौटती औरतों की बेबसी का शोर।  सब कुछ तेज़ रफ्तार से गुजरता हुआ मग़र कितना ठहरा हुआ। जैसे जिंदगी। 

तुम ❤️

मैं अपनी चेयर पर बैठा बाहर से आ रही ठंडी हवा को महसूस करता हूँ। दिन सामने खिड़की के काँच पर गिरते पानी की तरह फिसलता जाता है।  आहिस्ता आहिस्ता।  आँखों में नीम नींद भर आती है। बारिश के थमने तक ऑफिस की बाल्कनी पर शाम उतर आती है। बादलों की एक टीम आसमान में चलते चलते अचानक ठहर जाती है। जैसे कोई ऑफिस से घर जाती लड़की मार्केट में टंगे कपड़ों को देखकर ठहर जाती हैं।  बेवजह ही।  मैं अपना पीसी ऑफ करके मोबाईल चैक करता हूँ। उसमें किसी के उलाहने रखे हैं और रखी है एक रूठी हुई स्माइली। मैं मुस्कराता हूँ कि उसकी तल्खी से मौसम और भी दिलफरेब हो जाता है। मग़र।  उसको मुझसे शिकायत है कि मुझे ऑफिस से टाइम नहीं मिलता। मुझे उससे कहना है कि तुम्हारी याद से ही ये शाम खूबसूरत है।  तुम। ❤️

क्यूँ...

कभी कभी शाम का इंतजार दिन को बेहद लंबा कर देता है। हम ऑफिस के काम और जिंदगी के बीच बैलेंस बनाने की कशमकश में उलझे रहते हैं। हम थक जाते हैं। बेतहाशा। लगता है कि एक लंबी छुट्टी लेकर कहीं चले जाएं। मग़र यह नहीं सूझता कि कहां। कभी कभी।  एक शाम आकर सारी उलझनें बुहार देती है। घर लौटने की उम्मीद से शहर टिमटिमाने लगता है। बदन को सूकून आता है। मन गीत बुनने लगता है।  कि ये मौसम को अचानक क्या हो जाता है?  कभी कभी कोई इंतजार बेहद लंबा होता है। इतना कि हमें पता भी नहीं होता कि हम इंतजार में हैं। तुम अपने अंदर झाँकना और पूछना कि ये चुभन कैसी है? यूँ चुप चुप क्यूँ रहते हो, इस बैचैनी का सबब क्या है? मैं नहीं जान पाता कि मैं क्यूँ भटकता रहता हूँ एक कटी पतंग की तरह। शायद तुम जान पाओ।  दुआएँ। ❤️