Skip to main content

तुम बताओ?

एक मुसाफिर जानता है 
कि उसे कहाँ ठहरना है और कहाँ से कब चले जाना है
एक टैक्सी वाले को मालूम है 
कि किस मोड़ से इस शहर के बाहर जाकर भरा जा सकता है गिलास

एक गिलहरी को भी इल्म है 
कि पेड़ से गिरे बीज को कैसे कुतरना है
पेड़ का पत्ता पत्ता जानता है 
कि कब शाख से बिछड़ कर मिट्टी में मिल जाना है

पंछी दिनभर काम करके 
घर लौट कर करते हैं 
अपनी चोंच साफ़ 
बादल अपनी आदत से मज़बूर 
रोज बरसता है शहर पर, 
थोड़ा थोड़ा 

कि सब को मालूम है 
अपने अपने ज़रूरी कामों के बारे में। 

तुम बताओ, 
तुम प्रेम के बारे में क्या जानते हो?

Comments

Popular posts from this blog

हो सकता है

 मौसम विभाग ने कहा था की दस तारिख को बारिश होगी  उसने कहा था की दस तारीख को मिलेंगे  न बारिश हुई न वह मिलने आई।  हो सकता है इन दो बातों का एक दूजे से कोई लेना देना न हो। 

जैसे...

वॉयलिन की कोई उदास धुन बजाते हुए, जैसे मर गया हो कोई संगीतकार। जैसे कोई बूढ़ा ठहर गया हो अपनी आखिरी खुराक खाने से पहले ही। जैसे मुस्कराते हुए हिरन की गर्दन काट दी हो शिकारी ने और वह भूल गया हो आखिरी तड़प के दर्द को चेहरे पर लाना।  जैसे पुकारा हो तुमने मेरा नाम आखिरी बार जैसे मैं कर रहा हूँ इंतजार तुमसे मिलने का,  आखिरी बार।

वे दिन....

मैं अक्सर काम के सिलसिले में उसके घर की गली से गुजरता हूँ तो ख्याल आता है कि कहीं वह एक दफ़ा दिख जाए तो दिल को चैन आए. मगर वह तो ऐसे ग़ायब है कि कहीं कोई इशारा नहीं मिलता. चाहत है कि उससे मुलाकातों का सिलसिला फ़िर से शुरू हो. भले ही वह कुछ बोले न पर मेरे साथ मुझसे सटकर तो बैठे. जैसे कभी बैठे थे हम राजीव चौक के सेंट्रल पार्क में. एक दूजे में खोए मगर इक-दूजे से ही बे-ख़बर. वे दिन.... ♥