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कब...

खिड़की से हवा का झोंका रह रह कर आता। वह हर झोंके पर खिड़की के पल्लू को तह करता। ब्रश से स्ट्रोक तो इतने अच्छे लगा रहा था कि जैसे अपने अतीत को रंग रहा हो। मुझे तो जानबूझकर भटका हुआ रेल का कोई डिब्बा लगता है वो।  खिड़की पर ब्रश से स्ट्रोक मारते मारते पता नहीं किसके ख्यालों में खो जाता है। हर बार जब ब्रश कलर की छोटी बाल्टी में डुबोता है, होंठ गोल करके पता नहीं कौन सी नज़्म प्ले करता है ये। खिड़की के पार छत पर कोई काजल का पर्दा भी नहीं है कि जिसके पार वह अपने होंठों की धुन पहुँचाना चाहता हो। मुझे तो सच में, बड़ा अज़ीब लड़का लग रहा है।  पंखा बंद कर रखा है इतनी गर्मी में। कहता है पसीना न आए तो लगता ही नहीं कि दिन बीत रहा है। अपने माथे पर आए हर पसीने की बूँद को अँगुलियों से इतनी नफ़ासत से संभाल कर ख़र्च करता है जैसे यही उसकी कमाई हो। शायद है भी।  जब उसे कहा गया कि काम छोड़ो और चाय पी लो, तो इतनी ख़ुशी ख़ुशी सारा काम फ़ेंक कर बैठ गया जैसे किसी बच्चे को कह दो कि काम बंद करो तो वह अपनी पेंसिल और नोटबुक एक तरफ़ फ़ेंक देता है। कितना बचपना है इसमें। प्रोफ़ेसनालिटी नाम की त...