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Showing posts from December, 2021

हम जैसे हैं वैसे

कभी कभी हम काम, दौलत, नाम, शोहरत के पीछे अंधाधुंध दौड़ते जाते हैं। लालच वासना और हवस को प्रेम समझकर बाइक के पीछे दौड़ रहे कुत्ते की तरह भागते हैं।  किसी रोज़ अचानक मुँह पर एक लात पड़ती है। तो बैठकर सोचते हैं कि ये क्या कर रहे थे?  मुझे बचपन से ही साफ़ सुनने में प्रॉब्लम रही है। एक बात को सुनने के लिए मैं सामने वाले को दो से तीन बार कहने को मजबूर करता हूँ। हालाँकि कभी कभी महसूस होता है कि ये प्रॉब्लम से ज्यादा मेरी आदत बन चुकी है। संजय जी ने कहा कि मशीन लगा लो। धीरे धीरे आदत पड़ जाएगी तो उसका असर दिखना स्टार्ट हो जाएगा। मशीन मेरे पास सालों से पड़ी थी मग़र मैं लगाने से डरता था दोस्त हंसेंगे। कि लोग देखेंगे तो क्या क्या उपहास करेंगे।  मशीन लगाने के कुछ दिनों तक मैं बैचैन रहा। लगता रहा जैसे मुझसे मैं छूट रहा हूँ। कई बार मैंने बीच बीच में लगाना छोड़ भी दिया। मग़र ऑफिस में संजय जी को देखता तो फ़िर लगा लेता। उनके डर से मैंने 1 साल की मशीन की बैट्री ऑर्डर कर दी।  मशीन ने कुछ कुछ काम करना शुरू किया है। मैं बहुत झीनी और महीन आवाजें महसूस करने लगा हूँ। जैसे पंखे की ...

जैसे...

वॉयलिन की कोई उदास धुन बजाते हुए, जैसे मर गया हो कोई संगीतकार। जैसे कोई बूढ़ा ठहर गया हो अपनी आखिरी खुराक खाने से पहले ही। जैसे मुस्कराते हुए हिरन की गर्दन काट दी हो शिकारी ने और वह भूल गया हो आखिरी तड़प के दर्द को चेहरे पर लाना।  जैसे पुकारा हो तुमने मेरा नाम आखिरी बार जैसे मैं कर रहा हूँ इंतजार तुमसे मिलने का,  आखिरी बार।

क्या कीजै

बेमौसम आई बरसात की तरह प्रेम हमारे सामने से निकल जाता है। हम भीगना चाहते हैं मग़र आदतन छाता लेकर खड़े हो जाते हैं। बरसात चली जाती है और तब हम खुद को कोसते हैं कि क्या खड़े खड़े डर रहे थे और देखते रह गए? क्यूँ न भीग गए? वह क्या था जिसने हमें रोके रखा?  प्रेम जिससे हो जाए उससे करो। मग़र साथ उसके रहो जो तुम्हारी जिम्मेदारी उठा पाए। यह हमें बचपन से ही सिखाया जाता है। क्या उम्र और समझ बढ़ने के साथ-साथ प्रेम बुझ जाता है? या फिर प्रेम छूट जाने पर हम बड़ा और समझदार होना महसूस कर पाते हैं? हम दोनों ही इन सवालों का जवाब नहीं तय कर पाए।  इसलिए तुम वहाँ हो और मैं यहाँ हूँ।  तुम मुझे भूल जाने को मजबूर हो,  मैं तुम्हें याद आने को मजबूर हूँ।  क्या कीजै?

सबसे बड़ा सुख

सब कुछ भूल जाता हूँ मैं, इक तुम्हारा नाम याद आते ही। मैंने सुख की शक्ल में कुछ दुःख जेबों में भर लिए थे। या हो सकता है सुख के बीच छिपे दुःख उठा लिए हो, अनजाने ही। जैसे मैं कई बार मूँगफली के बीच छिलके उठा लिया करता हूँ। उन दुखों को बीन कर मैंने रख दिया है कालीन के नीचे। कि मैं नहीं बाँटना चाहता उन्हें किसी के साथ। मैं बस एक सुख चाहता हूँ। एक भरे पेड़ जितना घना सुख। जैसे काश तुम होती मेरे पहलू में तो मैं यूँ लिख ना रहा होता ये बेवजह की बात। मैं तुम्हें अपने दुःख सुनाता जाता और चूमता जाता तुम्हारे नर्म गुलाबी गालों को। तुम अपनी आँखें बंद कर लेती। खिड़की पर बैठी बिल्ली चाँद को बुझा देती। रात ढंक लेती खुद को रज़ाई से। और सुबह भूल जाती जागना। इससे बड़ा सुख और क्या होगा कि किसी सुबह मैं जागूँ गहरी नींद से और तुम मेरी बाहों में लिपटी हो। तुम मग़र उदास वहाँ, मैं भी हूँ तन्हा यहाँ। बस दूरियाँ हैं हमारे दरमियाँ। बस दूरियाँ, ओ जानाँ....