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जिंदगी न हुई

सोचते थे कि दिन भर दोस्तों के साथ पड़े रहेंगे। गिलासों से बूंदे सरक रही होगीं। शीशे की मेज़ पर चिप्स बिखरे होंगे। कोई रोक टोक करेगा तो उसकी कमर पर एक जोर की ठोकर मारेंगे।  मग़र क्या मालूम था कि दिन भर औंधे पड़े प्याले की तरह कुर्सी में पड़े रहेंगे और कीबोर्ड पर अंगुलियाँ घुमाते रहेंगे। कब सोचा था कि उसकी बाहों को छोड़ दीवारों से सिर टिकाना पड़ेगा।  जिंदगी न हुई कच्ची उम्र का प्रेम हो गया। साथ बैठे हैं मग़र समझ नहीं आ रहा कि क्या करें। मग़र कोई नी। ए जिंदगी, तुम जैसी भी हो बेहद सुंदर हो। लव यू। 

एक रफ़ूगर

उसके बालों की किनारी पर कुछ सफ़ेद बाल आ चुके थे। उसके चेहरे पर सिलवटें उसकी ज़िन्दगी की व्यस्तताएं बयां कर रही थी।  वह एक नजर नीचे रखे डॉक्युमेंट्स को देखती फ़िर मेरे सामने एक सवाल रख देती। मैं लैपटॉप में लिखता जाता अपने हुनर का सबूत। ओके। मैं तुम्हें दो दिन बाद कॉल करुँगी। उसने लैपटॉप बंद करते हुए कहा। मैं एक कॉफी लेकर ऑफिस से बाहर निकल आया। हवा में बारिश के बाद की हल्की नमी घुली थी। जैसे उसकी आँखों में घुला था एक स्याह खालीपन। सड़क के किनारे इंतजार में खड़े चाय और सिगरेट के स्टॉल्स के आगे, ऑफिस के बाद मिले दोस्त बचे हुए दिन को धुएँ में उड़ा रहे थे। हवा के झोंकों पर चढ़ते हुए ऊपर उठता हुआ धुआं बादलों की शकल में आसमाँ पर छा गया। उफ़क़ पर नीम अँधेरा छाने लगा। शाम पेड़ों से होते हुए सड़क पर उतर आई।  बस स्टैंड से कुछ दूरी पर एक रफ़ूगर बैठा हुआ था। उसने एक गत्ते पर लाल स्कैच से लिख रखा था कि यहां पुराने कपड़े रफ़ू किए जाते हैं। काश कोई दुकान होती जहाँ हम बीते दिनों को तरतीब में लाकर ज़िन्दगी रफ़ू कर लेते। कितना कुछ उधड़ा पड़ा है।  मग़र...  सड़क पर चलते हुए इक...