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Showing posts from September, 2019

ख़यालों के कुछ टुकड़े

एक मजदूर प्रेमी अपने महीने भर की तनख्वाह से अपनी महबूबा के लिए एक चाँद लाया. और महबूबा चाँद पर बैठकर किसी शहजादे के पास चली गई. *** किताबें इंसान को बिना पिए ही शराबी बना देती है। *** कभी कभी मैं महसूस करता हूँ कि मैं सर्द हवा का एक झोंका हूँ. जो हर सुबह एक नीली तितली की पीठ पर बैठकर अपने काम पर जाता है. और शाम को लौटता है एक बादल बनकर. *** ऑफिस का घर से दूर होना कितना मजेदार है! 2 घंटे की भीड़ भरी तन्हाई में कितना कुछ लिखा जा सकता है। *** इस दुनिया में हर चीज एक करिश्मा है. यह करिश्मा ही है कि मैं ऑफिस में कीबोर्ड पर टिक टिक करते वक़्त यह महसूस करता हूँ कि मैं अपनी अपनी प्रेमिका को ख़त लिख रहा हूँ. ख़त, जो हर शाम अधूरा रह जाता है. ***

कभी-कभी

भरोसा नहीं होता कभी-कभी मुझे कि यह कविता मैंने लिखी है. कभी-कभी भरोसा नहीं होता कि इतवार की दोपहर में मेरे सीने पर तुम्हारे सिर की जगह किताब रखी हुई है. भरोसा नहीं होता कभी कभी कि सुबह हो गई है और मैं ज़िंदा हूँ. कभी कभी दिल करता है कि लिखूँ एक कविता सच्चे प्रेम के नाम पर, अब भरोसा नहीं होता.

इश्क़ में शहर होना

वे दोनों पीरागढ़ी चौक पर एक दिन अचानक मिले. उसके बाद वे हर रविवार यहाँ नियम से मिलने लगे. वह अपनी पल्सर पर हैलमेट लगाए पीरागढ़ी के मैन-स्टैंड पर ठीक दस बजे उसका इंतजार करता. वह अपने चेहरे पर स्कार्फ बांधे हमेशा ही लेट आती. उसे पॉल्यूशन से ज्यादा डर दिल्ली के कौने-कौने में बसे उसके रिश्तेदारों का होता. कहीं कोई देख ले तो शामत ही आ जाए. पीरागढ़ी चौक से वे आजादपुर की तरफ़ चल देते और उनकी बातों का सिलसिला चल पड़ता. ट्रक और बसों के भारी भरकम हॉर्न के दर्दनाक शोर की वजह से उन्हें अपनी बातों को कई बार और तेज़ आवाज़ में कहना पड़ता. दोनों चाहते कि वे कहीं रुककर थोड़ी देर कुछ बात कर लें. एक दूजे से पूछ लें कि तुम कैसे हो? मग़र दिल्ली जैसे शहर में भी उनके लिए दो पल आराम से बात करने के लिए जगह न होती. लोग उनके इर्दगिर्द इकठ्ठे हो जाते और उन्हें घूरते जो उन्हें बड़ा अनकंफर्टेबल लगता. दो सालों से वे इसी तरह मिलते और अपने ख्यालों में इश्क़ का शहर बुनते रहते. आजादपुर से आगे जाते हुए नॉर्थ कैम्पस में कुछ देर साथ चाय पीने के लिए ठहरते और फ़िर उसी पल्सर में एक दूजे से चिपके बातें करते हुए ...

ख़त

मेरी गर्दन पर अभी तक रखा हुआ है, उस शैतान के जंगली होकर चूमने का निशान। हालाँकि ये एक जन्म पुरानी बात है। ओ शैतान.... कहाँ हो तुम? कि प्रेमिका तुम्हारी, तन्हा है बिन तुम्हारे...