ठीक ठीक नहीं पता कि क्यूँ। मग़र शामें मुझे इंतजार से भरी ही लगती हैं। घर जाने के इंतजार में कैबिन के नीचे रखे जूते। घोंसले पर चिड़िया के आने के स्वागत में चोंच खोले बैठे चिड़िया के नन्हें बच्चे। पड़ोस से आती चाय की महक। बालकनी में खड़ी हर गुज़र को उम्मीद से देखती पत्नियाँ। जलने के इंतजार में चौराहे पर खड़ा एक लैम्पपोस्ट। कि कितना कुछ ठहरा हुआ है इंतजार में। मग़र हमें ऑफिस से भागते हुए घर जाने की इतनी जल्दी रहती है कि हम सामने से गुज़र रहे जीवन को देखना ही भूल जाते हैं। हमें सड़क के पहलू से उठती जाती धूप नहीं दिखती। हम देख ही नहीं पाते शहर के होंठो पर ठहरा हुआ किसी आने वाले का नाम। हम जीवन बनाने में इस कदर खोए होते हैं कि ठहर कर जीवन को महसूसना ही भूल जाते हैं। हमारी कहीं पहुँचने की चाहना हमें पास से गुज़रती आहटों के प्रति शून्य कर देती है। कि क्या ही हो सकता है हमारा। मैं मग़र इस बाईपास के नीचे फ़ैले चबूतरे पर बैठ जाना चाहता हूँ। हर गुज़रते शख्स को पढ़ना चाहता हूँ कि किताबों से अब ऊब होने लगी है। रुकी हुई बसों की तस्वीर उतार लेना चाहता हूं कि जान सकूँ रुके हुए चलते जान...