ट्रैफिक में फंसी कार की तरह साँसे चलती हैं और ठहर जाती है। दिल धड़कता है फिर चुप हो जाता है। सुबह होती है। दिन ढ़ल जाता है। शाम दूर जाती किसी टैक्सी की तरह बुझती जाती है। सड़क पर शोर बनते और बुझते हैं। बस की खिडकियों के शीशों से निकलती धुन एक सम्मोहन बाँधती हैं। मैं सड़क के किनारे बने तंबुओं को देखने लगता हूँ। एक कोई अधेड़ उम्र की महिला ईंटों का चूल्हा बनाकर रोटी सेंक रही है। अंदर बेड में कोई आदमी टीवी देखता लेटा हुआ है। वे बस में बैठे बैग लिए लोगों से कितने अलग हैं। उनके चेहरे पर कोई शिकायत नहीं है। जैसे कि वे जो चाहते थे उन्हें मिल गया हो। घर लौटने के इंतजार में घर आ जाता है। हम सड़क पर चलते हुए सोचते हैं कि किसी पुराने वक्त से टकरा जाएं। किसी से मिलने पर चाहने लगते हैं कि कुछ देर साथ ठहर कर बातें कर लें। और कभी किसी के साथ ठहरे हुए अचानक ऊब जाते हैं। असल में हम जो चाहते हैं वह हर पल घटित हो रहा है। हमने अपने ख्वाबों में जैसे जीवन के बीज बोए थे वे असल में खिल चुके हैं। जिस जीवन की हम कामना करते हैं असल में वह हमारे साथ ही चल रहा होता है। हम यह बात जानते भी हैं मग़र म...