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Showing posts from October, 2021

हम जो चाहते हैं

ट्रैफिक में फंसी कार की तरह साँसे चलती हैं और ठहर जाती है। दिल धड़कता है फिर चुप हो जाता है। सुबह होती है। दिन ढ़ल जाता है। शाम दूर जाती किसी टैक्सी की तरह बुझती जाती है।  सड़क पर शोर बनते और बुझते हैं। बस की खिडकियों के शीशों से निकलती धुन एक सम्मोहन बाँधती हैं। मैं सड़क के किनारे बने तंबुओं को देखने लगता हूँ। एक कोई अधेड़ उम्र की महिला ईंटों का चूल्हा बनाकर रोटी सेंक रही है। अंदर बेड में कोई आदमी टीवी देखता लेटा हुआ है। वे बस में बैठे बैग लिए लोगों से कितने अलग हैं। उनके चेहरे पर कोई शिकायत नहीं है। जैसे कि वे जो चाहते थे उन्हें मिल गया हो। घर लौटने के इंतजार में घर आ जाता है। हम सड़क पर चलते हुए सोचते हैं कि किसी पुराने वक्त से टकरा जाएं। किसी से मिलने पर चाहने लगते हैं कि कुछ देर साथ ठहर कर बातें कर लें। और कभी किसी के साथ ठहरे हुए अचानक ऊब जाते हैं। असल में हम जो चाहते हैं वह हर पल घटित हो रहा है। हमने अपने ख्वाबों में जैसे जीवन के बीज बोए थे वे असल में खिल चुके हैं। जिस जीवन की हम कामना करते हैं असल में वह हमारे साथ ही चल रहा होता है। हम यह बात जानते भी हैं मग़र म...

बारिशें

कबूतर बैठ जाते हैं बिजली की तारों पर बच्चे दौड़ पड़ते हैं सड़कों पर छपाके मारते हुए बादल निकल पड़ते हैं शहर देखने  हवा की कमर में हाथ डाले और मैं बैठ जाता हूँ  अँगुलियों में कलम फंसाये और हाथों में डायरी लेकर।  कि सबका अपना अपना अंदाज़ होता है  बारिशों में भीगने का। 

फाटक

रेल्वे फाटक के सिग्नल की तरह दिल पता नहीं किसके इंतजार में खड़ा रहता है,  हसरतों की सड़क पर।  *** आजकल दिन चुपके से गुजर जाते हैं। शामें आहिस्ता से रात के पहलू में सिमट जाती हैं। मैं बस की पिछली सीट पर बैठा ये सोच रहा होता हूँ, कि हवा मेरे चेहरे पर लिखती जाती है कोई भीगा नग़मा। मैं आसमान में घर लौटते पंछियों से पूछता हूँ कि आज क्या जिया? कैसे पता करोगे कि ये दिन सिर्फ गुज़ारा भर है या जिया भी है? पेड़ से पत्ते गिरते हुए ठहर जाते हैं। पंछी चहक कर भूल जाते हैं अपनी चोंच बंद करना। ऑफिस की पास वाली गली में गुज़रते हुए मज़दूर फेंक देते हैं अपनी आधी बची सिगरेटों को। लड़कियां तोड़ देती हैं अपने बैग में छुपाया हुआ आईना। मैं ख़ुद से पूछता हूँ कि क्या बात है डियर, ये कैसे सवाल कर रहे हो? मन किसी डांट खाते बच्चे की तरह चुप खड़ा रहता है। दिल में कई हसरतें मुट्ठी से फिसलती रेत की तरह बिखर जाती हैं।  जब कोई जवाब नहीं मिलता तो मैं लिखने लगता हूँ ये छोटी छोटी बातें। एक झुंड पंछियों का शोर करता हुआ गुज़र जाता है शहर के ऊपर से। हसरतें। ख़्वाब। ज़िंदगी। शाम। तुम। 🤍 #poetry #ins...

प्रेम...

छत पर मूँगफली के छिलके बिखरे पड़े हैं उन्हीं के बीच पड़े हैं कुछ दाने ठुकराए हुए से  जैसे कोई जरूरी कामों के बीच  भूल गया हो प्रेम को। *** वह दोनों सड़क के किनारे शायद किसी बस के इंतजार में खड़े थे। लड़की ने अपने कंधे पर एक बड़ा सा डफल बैग टांग रखा था। लड़के के दोनों हाथ जीन्स की जेब में थे। उसने अपनी शर्ट के पॉकेट से लाइटर निकाला और एक सिगरेट जला ली। लड़की की आँखें हवा के हर झोंके के साथ धुएँ से भर जाती। लड़का उसकी तरफ़ देखता तो वह मुस्कुरा देती। प्रेम भी पता नहीं क्या चीज़ होती है। कोई कर के पछताता। कोई ना करके।  *** दिल बेधड़क सुर बुनता जाता है। ज़िंदगी अपनी रफ़्तार से बीतती जाती है। दिन ऑफिस के कामों में कट जाता है। रात करवटें लेते गुजर जाती है। इसी बीच मुझे तुम्हें प्यार करना होता है। इन्हीं सब के बीच मैं तुम्हें याद करता हूँ। तुम्हारे लिए तोहफ़े सोचता हूँ, झुमके चुनता हूँ और पायलें लेता हूँ।  जरूरी नहीं कि जो दिन भर मैसेज न करता हो वह याद भी न करता हो।  समझा करो।  कि जिंदगी बिखरी हुई है और उसे बुहारने वाला लापता है। #Rohankidiary #poetry #...

सपने

हर हकीकत एक सपने से शुरू होती है। सपने तुम्हारी हसरतों के पौधे होते हैं। जब भी वक्त मिले उनसे पूरे मन से मिलो। उनके पास बैठो, उन्हें गले लगाओ। ख़ुद से पूछो कि इस ख्वाब को ताबीर करने के लिए तुम्हें क्या करना होगा? लाइफ का असली मकसद जवाब ढूँढना नहीं, बल्कि वे सवाल ढूँढना है जिनके जवाब तुम्हारे अंदर छिपे हुए हैं। चियर्स! 💫

मेरा लालच

हॉट स्टार पर चलते आईपीएल की तरह ज़िन्दगी ठहर जाती है कई बार उलझनों की बफरिंग की वजह से। ऐसे में क्या मुझे ज़िन्दगी रिस्टार्ट कर देनी चाहिए मोबाईल की तरह? या फ़्लाइट मोड में डाल कर छोड़ देनी चाहिए कुछ देर के लिए कि सारी चिंताएँ ऐरोप्लेन की तरह उड़ जाएं सर के ऊपर से। कुछ नहीं सूझता। घर से ऑफिस जाते हुए बस में किताब खोल लेता हूँ। अपने सफ़र में खो जाता हूँ। आगे वाली सीट पर बैठी लड़की ने एक इयर पीस अपने लेफ्ट कान में लगा रखा है और एक को अपने दाँतों में। माइक उसकी गर्दन पर लटका हुआ है। उस पार से शायद किसी ने लव यू कहा हो कि वह कुछ देर राइट इयर पीस को अपनी अँगुली में घुमाती है और कुछ देर सोचने के बाद हल्के से कहती है 'टू यू ट'। उसने यह कहने से पहले कुछ देर क्या सोचा था? हर दिल चिटका हुआ है मोबाइल की स्क्रीन की तरह। हर शख्स तन्हा है चौराहे पर खड़ी की मूर्तियों की तरह। मैं मग़र तुम्हारी याद में ही भीगा रहता हूँ। जब चाहूँ तुम्हें छू सकता हूँ अपनी अँगुलियों में। तुम्हें देख सकता हूँ अपनी आँखों में। तुम्हारे होने को तुम्हारे होने की ज़रूरत नहीं है। ये तो मेरा लालच है कि तुम पास...

सपना ही होगा शायद

नदियाँ लौटने लगीं अपने उद्गम की ओर। हवा ठहर कर शांत हो गई। पेड़ बढ़ने की बजाय सिमट गए अपनी जड़ों में।  समंदर उड़ गया ऊपर की ओर बारिश बन कर। और बूढ़े आदमी दौड़ने लगे एक गेंद के पीछे और बच्चे हो गए। सपना होगा शायद ये आज दोपहर का कोई। सच तो नहीं ही हो सकता। वर्ना तुम भी लौटकर चली आ रही होती मेरी तरफ़।

जिंदगी न हुई

सोचते थे कि दिन भर दोस्तों के साथ पड़े रहेंगे। गिलासों से बूंदे सरक रही होगीं। शीशे की मेज़ पर चिप्स बिखरे होंगे। कोई रोक टोक करेगा तो उसकी कमर पर एक जोर की ठोकर मारेंगे।  मग़र क्या मालूम था कि दिन भर औंधे पड़े प्याले की तरह कुर्सी में पड़े रहेंगे और कीबोर्ड पर अंगुलियाँ घुमाते रहेंगे। कब सोचा था कि उसकी बाहों को छोड़ दीवारों से सिर टिकाना पड़ेगा।  जिंदगी न हुई कच्ची उम्र का प्रेम हो गया। साथ बैठे हैं मग़र समझ नहीं आ रहा कि क्या करें। मग़र कोई नी। ए जिंदगी, तुम जैसी भी हो बेहद सुंदर हो। लव यू। 

लिखना

किसी को ऑफिस में छुप कर देखते जाना और उसके देखते ही पानी की बोतल ढूँढने लगना बीच सड़क पर किसी की कमर में हाथ डाल देना किसी को भरी मार्किट में बेपरवाह चूम लेना किसी का हाथ खींचकर दिसम्बर की इक रात में  अपने ऊपर ओढ़ लेना भरी गर्मी की दोपहर में किसी की गर्दन पर रखी बूँदों को पी लेना  किसी को सितारों भरी रात में छत पर बिछा लेना।  ये सब उतना ही रोमांचक है जितना कि इन लम्हों को लिख लेना। कि लिखना बीते और आने वाले लम्हों को फ़िर से जी लेना है। 

तुम हो कि...

जादूगर मूँगफली वाले की तरह अपने पिटारे से तरह-तरह के अचम्भे निकालता जाता। लोग कपड़े की दुकान के आगे खड़े पुतले की तरह देखते जाते। लोगों को लगता कि वे जादू के सम्मोहन में है। मग़र असल में यह शाम थी जो उनकी आँखों में तिलिस्म फूँक रही थी।  मैं इस मायाजाल में नहीं फंसता हूँ कि मेरी जेबों में तुम्हारे होंठो के गुलाबी फाहे रखे हैं। दिल में तुम्हारे बालों में फंसे क्लेचर की चुभन अटकी हुई है। गर्दन में तुम्हारे दाँतों की टीस है जो मुझे इस मायावी दुनिया से मुक्त रखती है। मैं एक शैतान हूँ और तुम शैतान की प्रेमिका। मेरे यह कहते ही तुम मेरे गालों पर अपने दांत गड़ा देती हो। हरी नीली बसें एक्सीलेटर छोड़कर ब्रेक लगा देती हैं। ट्राफिक पुलिस वाला सर पे हाथ रखकर बैठ जाता है एटीएम के बाहर बने फुटपाथ पर। मूँगफली वाला देखने लगता है दूसरी तरफ़ जैसे उसने कुछ देखा ही न हो अभी अभी।  अभी तो सर्दियाँ शुरू भी नहीं हुई और तुम हो कि ओस की तरह गिरने लगी हो मुझपर। रहम करो कि बरबाद हो जाएगा ये शहर भी मेरी तरह।  मैं और तुम। जैसे कोई कहानी। हैं भी और नहीं भी हैं हम। चियर्स। 

क्या पहले बता देना चाहिए था?

मैं हर शाम बालकनी में आराम कुर्सी पर बैठा किताब पढ़ता। कहीं पास से कुछ चिडियों के बच्चों की आवाजें आती। एक रोज़ में किताब कुर्सी पर रखकर उन आवाजों का पीछा करने लगा। घर के पिछवाड़े में रखे कबाड़े पर एक पेड़ गिरकर टूट गया था शायद। उसमें से दो नन्हीं सुराहीदार गर्दन दिखाई दी। मैं अचम्भे से भर गया कि जीवन का कोई ढब नहीं है कि वह अनपेक्षित जगहों पर भी खिल उठता है।  मैंने उस घोंसले को उठाकर पास के पेड़ पर रख दिया। शाम को मम्मा बुलबुल बच्चों की आवाजों का पीछा करते हुए सीधे उस पेड़ पर पहुँच गई। या शायद उसने मुझे घोंसला वहां रखते हुए देख लिया हो। पता नहीं। अगली शाम मैं आदतन कुर्सी पर बैठा किताब पढ़ रहा था। मैंने देखा कि वह बुलबुल कपड़े सुखाने के तार पर आकर बैठ गई है। वह मुझे एकटक देखती रही जैसे पूछना चाहती हो कि तुमने मेरे लिए इतना क्यूँ किया। बाद इसके वह कभी छत पर तो कभी बरामदे पर मेरे पास आकर बैठ जाती और कभी मुझे देखती कभी मेरे पास रखी किताबों को। एक दिन मैं अपने कमरे में बिस्तर पर अधलेटा कोई किताब पढ़ रहा था। मेरी बेटी दौड़ती हुई मेरे ऊपर चढ़ गई और किताब पास की खिड़की पर टिका...

ख्वाब कहानियाँ ख़त इबादत

ख्वाब कहानियाँ ख़त इबादत सब लिखे जाएंगे ।मैं इन दिनों खाली हूँ यारों, कुछ काम दे दो! 

दिलफरोश

तस्वीरें तिरी हर शाम मैं सीने से लगा रखती हूँ। खिड़की के पास बैठी तेरी राह तकती हूँ । किस शहर में है वो किस हाल में रहता है। हर गुज़रते झोंके से ये सवाल किया करती हूँ। तू यूँ अलविदा कहे बिना। न जाने कहाँ चला गया मुझसे मेरा हाल पूछे बिना। खिड़कियाँ, दरवाज़े, मेहराबें पूछती है मुझसे कि आँखों का काजल क्यूँ ज़ाया करती हूँ?। मैं उन्हें क्या जवाब दूँ, ए दिलफरोश!?! 

ठहर कर जीना

ठीक ठीक नहीं पता कि क्यूँ। मग़र शामें मुझे इंतजार से भरी ही लगती हैं। घर जाने के इंतजार में कैबिन के नीचे रखे जूते। घोंसले पर चिड़िया के आने के स्वागत में चोंच खोले बैठे चिड़िया के नन्हें बच्चे। पड़ोस से आती चाय की महक। बालकनी में खड़ी हर गुज़र को उम्मीद से देखती पत्नियाँ। जलने के इंतजार में चौराहे पर खड़ा एक लैम्पपोस्ट। कि कितना कुछ ठहरा हुआ है इंतजार में। मग़र हमें ऑफिस से भागते हुए घर जाने की इतनी जल्दी रहती है कि हम सामने से गुज़र रहे जीवन को देखना ही भूल जाते हैं। हमें सड़क के पहलू से उठती जाती धूप नहीं दिखती। हम देख ही नहीं पाते शहर के होंठो पर ठहरा हुआ किसी आने वाले का नाम। हम जीवन बनाने में इस कदर खोए होते हैं कि ठहर कर जीवन को महसूसना ही भूल जाते हैं। हमारी कहीं पहुँचने की चाहना हमें पास से गुज़रती आहटों के प्रति शून्य कर देती है।  कि क्या ही हो सकता है हमारा। मैं मग़र इस बाईपास के नीचे फ़ैले चबूतरे पर बैठ जाना चाहता हूँ। हर गुज़रते शख्स को पढ़ना चाहता हूँ कि किताबों से अब ऊब होने लगी है। रुकी हुई बसों की तस्वीर उतार लेना चाहता हूं कि जान सकूँ रुके हुए चलते जान...

हो जाने दो बरबाद

दिन का आखिरी पहर था ढल गया। रेहड़ी वालों ने शाम के स्वागत में  बिछा ली मूँगफलियाँ। एक भीड़ लोगों की बढ़ने लगी मार्केट की जानिब।   फेरी वालों ने दी आवाजें ग्राहकों को दूर से जैसे कोई पुकारे नाम महबूब का  सड़क के उस छोर से।  बादलों की एक शैतान टोली ने शहर पर डाल दी डकैत हवा ने फूँक मारकर बिछा दी चादर धूल की दूर दूर तक। लोग परेशान होकर लौटने लगे अपने अपने घरों को। मैं टैक्सी में बैठ जब ये देख रहा था तब मास्क के पीछे छुपी उसकी आँखों ने कहा कि मैं हवा हूँ और तुम बादल हो हो जाने दो बरबाद इस शहर को। 

यहां आओ

पाँच बजे हैं। घर जाने का वक्त हुआ है। सारा दिन ऑफिस में फ़ाइलें तह करते करते पिंडलियों में दर्द होने लगता है। थक जाती होगी तुम। यहाँ आओ, इस शाम को अपनी हथेली में रखकर तुम्हारा सर चम्पी कर दूँ। आराम आए थोड़ा सा तुम्हें।