कबूतर बैठ जाते हैं बिजली की तारों पर
बच्चे दौड़ पड़ते हैं सड़कों पर छपाके मारते हुए
बादल निकल पड़ते हैं शहर देखने
हवा की कमर में हाथ डाले
और मैं बैठ जाता हूँ
अँगुलियों में कलम फंसाये और हाथों में डायरी लेकर।
कि सबका अपना अपना अंदाज़ होता है
बारिशों में भीगने का।
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