काश ऐसा हो कि तुम फ़िर से हो जाओ इक्कीस साल की और अपनी किसी सखी के साथ कॉलेज जाओ मैं रोज़ सुबह, ठीक उसी वक़्त, जब तुम निकलती हो कॉलेज के लिए, गली के छोर पर खड़ा रहूँगा कि देख सकूँ तुम्हें अपना दिन शुरू करने से पहले या फिर ऐसा हो बाजार की किसी किराने की दुकान पर तुम मिल जाओ कभी मुझे, अचानक ही मैं देखा करूँगा तुम्हें अपनी आंखों के किनारों से चुपके चुपके हो तो कितना अच्छा हो कि मैं किसी बस में मिलूंगा कभी तो तुम देख के मुझे चुराना नजरें और कोशिश करना न मुस्कुराने की अपने होंठो को अपने दातों से दबाते हुए मैं पकड़ लूँगा तुम्हें तुम्हारे शर्माते हुए चेहरे के साथ और हो जाना चाहूंगा एक चित्रकार कि पैंट कर सकूँ तुम्हारा वो चेहरा और छुपा सकूँ अपने कमरे की किसी अजानी जगह पर या क्यूँ न ऐसा हो जाए कि किसी बारिश वाले दिन में भूल जाओ तुम अपना छाता और मैं तुम्हें अपने छाते के नीचे बुला लूँ फ़िर तेज हवा से छाता हाथों से छूटकर उड़ जाए कहीं और भीग जाएँ हम पहले प्यार की पहली बारिश में.