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Showing posts from August, 2021

तमाशा है सब...

मेरे नए दोस्त मेरे घर आए। उन्होंने कहा कि तुम कुछ नहीं कर सकोगे क्यूँकि तुम थोड़े अलग हो। आर्टिस्ट का यहाँ कोई फ्यूचर नहीं होता।  मैं यह सुनकर घबरा गया। मुझे पसीना आने लगा। अगले ही दिन से मैंने नौकरी ढूँढनी शुरू कर दी। एक सप्ताह बाद मैं एक अच्छी कंपनी में जॉब करने लगा।  मैं ख़ुश था। इस बात पर नहीं कि मुझे नौकरी मिल गई, इस बात के लिए कि वे लोग कोई नौकरी नहीं कर रहे थे पर मैं अब कर रहा था।  मुझे लगा वे लोग उदास होंगे। मैं उन्हें देखने उनमें से एक के घर गया। मैं चौंक गया कि वे सारे लोग एक साथ बैठे थे और कुछ बातें कर रहे थे। मुझे लगा शायद अपना अपना दुःख बांट रहे हैं आपस में।  मग़र नहीं। वे लोग मनाली जाने का प्लान बना रहे थे। उन्होंने मुझे देखते हुए कहा कि सॉरी यार, हम तुम्हें ले चलना चाहते हैं पर अब तो तुम जॉब करने लगे हो तो तुम तो जा नहीं पाओगे। और वे हँसने लगे।  मुझे लगा मेरे साथ धोखा हुआ है। मैं झेंप गया। मैंने बनावटी मुस्कान बिखरते हुए कहा कि अरे नहीं, मैं वैसे भी नहीं जाना चाहता, मुझे पसंद नहीं ये घूमना वूमना। वे लोग फ़िर हँसने लगे। ज़ोर ज़ोर से। मु...

दोस्ती ठहर गई

स्कूल यूनीफॉर्म फॉर्मल ड्रेस से रिप्लेस हो गई। किताबें ऑफिस फाइल्स में बदल गई। गले में हाथ डाले बैठे हुए न जाने कितने ज़माने हो गए। सब कुछ इतनी सरलता से बीतता गया कि जैसे बीती हुई मस्तियाँ कोई स्वपन हों।  मग़र कुछ लम्हें थे जो एक तस्वीर की तरह ठहरे रहे। मन बार बार उनके क़रीब जाने को चाहता।  कुछ बरसों बाद हम मिले।  वह मिलना ऐसा था कि जैसे बादल आपस में मिलते हैं। हमने टूट कर बातें की। बेवकूफ़ी भरे चुटकुले कहे। साथ साथ चले। पुरानी यादों को ताज़ा किया। नई यादों की नींव रखी। और फिर बिछड़ गए। एक लंबे समय के लिए। न कॉल। न व्हट्सएप। न ही शिकायतें। सब ने अपना अपना बिजी रहने का बहाना चुन लिया। कुछ कैरियर में लग गए। कुछ ने घर बनाया। और कुछ ने घर बसाया। इन सबके बीच हम बेमौसम बारिश की तरह मिले। मिले और बिछड़ गए। मौसम बीतते गए और दोस्ती ठहर गई। अक्सर कोई याद अचानक आकर हाथ थाम लेती है तो मैं उसके साथ पुरानी तस्वीरें देख लेता हूँ। उस पेंटिंग के सामने कुछ देर खड़ा हो जाता हूँ जो मैंने शब्दों से उतारी थी। मग़र मन नहीं भरता कि जो बात गले में हाथ डाले साथ चलने में है वह याद करने ...

मेरा लिखना क्या है?

क्या होता अगर मैं उन बातों को लिख पाता. वे बातें जो तुम्हारे मेरे बीच कभी हुई नहीं. क्या होता ग़र हम कुछ दिनों और साथ रहते. क्या होता अगर हम कुछ देर और सेंट्रल पार्क में हाथ थामे टहलते और चूमने के लिए कोई कोना तलाशते. क्या होता अगर... पता नहीं क्या होता. एक कहानी लिखने के बारे में सोचना मुझे रोमांच से भर देता है. कैसे एक बीज में छुपा होता है एक पेड़? कैसे बूँद बूँद बारिश में छुपा होता है समंदर? कभी सोचा है तुमने? मैंने सोचा. इसलिए शब्दों से उगा ली कई सारी कहानियाँ. इन दिनों मैं हॉस्पिटल के चक्कर काट रहा हूँ. तरह-तरह के मरीजों को देखकर आभास होता है कि वक्त तेज़ी से बढ़ता जा रहा है मग़र जिंदगी ठहर सी गई है. एक तेज चुभन मेरी रीढ़ की हड्डी से होकर गुजर जाती है. हो सकता है तुम इसे मेरा कमीनापन कहो मग़र मुझे इसमें भी एक कहानी दिखाई देने लगती है. मैं खुद को इसी हॉस्पिटल के किसी बिस्तर पर दीवार का सहारा लिए बैठे देखता हूँ. मैं किस बीमारी के चलते यहाँ आया मुझे मालूम नहीं मग़र मैं इतना स्वस्थ हो चुका हूँ कि मेरे हाथ में मेरा लैपटॉप है और दिमाग़ में कई सारी कहानियाँ.  मैं अक्सर सो...