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दोस्ती ठहर गई


स्कूल यूनीफॉर्म फॉर्मल ड्रेस से रिप्लेस हो गई। किताबें ऑफिस फाइल्स में बदल गई। गले में हाथ डाले बैठे हुए न जाने कितने ज़माने हो गए। सब कुछ इतनी सरलता से बीतता गया कि जैसे बीती हुई मस्तियाँ कोई स्वपन हों। 

मग़र कुछ लम्हें थे जो एक तस्वीर की तरह ठहरे रहे। मन बार बार उनके क़रीब जाने को चाहता। 

कुछ बरसों बाद हम मिले। 

वह मिलना ऐसा था कि जैसे बादल आपस में मिलते हैं। हमने टूट कर बातें की। बेवकूफ़ी भरे चुटकुले कहे। साथ साथ चले। पुरानी यादों को ताज़ा किया। नई यादों की नींव रखी।

और फिर बिछड़ गए। एक लंबे समय के लिए। न कॉल। न व्हट्सएप। न ही शिकायतें।

सब ने अपना अपना बिजी रहने का बहाना चुन लिया। कुछ कैरियर में लग गए। कुछ ने घर बनाया। और कुछ ने घर बसाया। इन सबके बीच हम बेमौसम बारिश की तरह मिले। मिले और बिछड़ गए। मौसम बीतते गए और दोस्ती ठहर गई।

अक्सर कोई याद अचानक आकर हाथ थाम लेती है तो मैं उसके साथ पुरानी तस्वीरें देख लेता हूँ। उस पेंटिंग के सामने कुछ देर खड़ा हो जाता हूँ जो मैंने शब्दों से उतारी थी। मग़र मन नहीं भरता कि जो बात गले में हाथ डाले साथ चलने में है वह याद करने में नहीं।

इस बार हम मिले तो गले में हाथ डाले देर तक साथ बैठे रहेंगे और वक्त को रोककर एक पेंटिंग हो जाएंगे। 

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हो सकता है

 मौसम विभाग ने कहा था की दस तारिख को बारिश होगी  उसने कहा था की दस तारीख को मिलेंगे  न बारिश हुई न वह मिलने आई।  हो सकता है इन दो बातों का एक दूजे से कोई लेना देना न हो। 

जैसे...

वॉयलिन की कोई उदास धुन बजाते हुए, जैसे मर गया हो कोई संगीतकार। जैसे कोई बूढ़ा ठहर गया हो अपनी आखिरी खुराक खाने से पहले ही। जैसे मुस्कराते हुए हिरन की गर्दन काट दी हो शिकारी ने और वह भूल गया हो आखिरी तड़प के दर्द को चेहरे पर लाना।  जैसे पुकारा हो तुमने मेरा नाम आखिरी बार जैसे मैं कर रहा हूँ इंतजार तुमसे मिलने का,  आखिरी बार।

वे दिन....

मैं अक्सर काम के सिलसिले में उसके घर की गली से गुजरता हूँ तो ख्याल आता है कि कहीं वह एक दफ़ा दिख जाए तो दिल को चैन आए. मगर वह तो ऐसे ग़ायब है कि कहीं कोई इशारा नहीं मिलता. चाहत है कि उससे मुलाकातों का सिलसिला फ़िर से शुरू हो. भले ही वह कुछ बोले न पर मेरे साथ मुझसे सटकर तो बैठे. जैसे कभी बैठे थे हम राजीव चौक के सेंट्रल पार्क में. एक दूजे में खोए मगर इक-दूजे से ही बे-ख़बर. वे दिन.... ♥