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नियति

खिड़की से हवा का एक झोंका आता। डेस्क पर रेत पसरती जाती। किताबों के पन्ने कुछ पल कांपते और ठहर जाते। जैसे कोई थका हुआ मजदूर गहरी नींद से अचानक उठ गया हो और फिर से सो गया हो। काम करते अचानक जब ऊब होने लगती तो आँखें कौने कौने को ऑब्जर्व करने लगती। ऊपर लगी खिड़की से आती रोशनी की परछाई में एक मकड़ी ने जाल बुना है। एक मकोड़ा कुछ देर उस जाल में फंसा छटपटाता है और फिर आहिस्ता आहिस्ता दम तोड़ देता है। जैसा कि एक रोज़ लालच से उपजे प्रेम का हाल होता है। मैं अपने कैबिन से बाहर आ जाता हूँ। टहलते हुए अचानक उलझन में खो जाता हूँ कि मकोड़े के हाल पर आश्चर्य किया जाए या दुःखी हुआ जाए। ऐसा सोचते मैं अचानक एक मकोड़े में बदल जाता हूँ और धूल भरी सड़क पर रेंगने लगता हूँ। चलते हुए अचानक पाता हूँ कि आगे किसी ने जाल बिछाया हुआ है। मैं कुछ पल को ठहर जाता हूँ। अचानक ख्याल आता है कि सबकी अपनी नियति होती है कि जिसे जहाँ जाना होता है वह उसी तरफ़ जाता है।  हो सकता है कि उसके जाल में फंसना ही मेरी नियति हो। दूर से चमकती उसकी आँखें रेगिस्तान में पानी के भ्रम के जैसी थी। मैं अपने हाल पर मुस्कराता हूँ और ...

यहां आओ

पाँच बजे हैं। घर जाने का वक्त हुआ है। सारा दिन ऑफिस में फ़ाइलें तह करते करते पिंडलियों में दर्द होने लगता है। थक जाती होगी तुम। यहाँ आओ, इस शाम को अपनी हथेली में रखकर तुम्हारा सर चम्पी कर दूँ। आराम आए थोड़ा सा तुम्हें। 

ये कशिश कैसी थी?

अचानक कोई आवाज़ सुनाई पड़ती है। जैसे कुछ टूटकर गिर बिखर गया हो। मैं इधर उधर देखने लगता हूँ। सबकुछ वैसे ही है जैसे पहले था। फ़िर ये आवाज कैसी थी? मैं ख़ुद को अपनी चेयर पर छोड़कर ऑफिस से बाहर आ जाता हूँ। दोनों हाथों से अपनी जेबों को टटोलता हूँ। दो बार टक टक की आवाज के बाद सिगरेट सुलगने लगती है। एक अजीब सा हल्कापन दिमाग़ पर तारी हो जाता है। मैं रुई के फाहे सा हल्का हो जाता हूँ।  सड़क पर धूप का आईना फ़ैला हुआ है। एक लड़का एक लड़की को मना रहा है। लड़की बार बार हाथ छिटक कर आगे बढ़ जाती है।  वह उन्हें देखकर मुस्कराती है।  मैं एक लंबा कश लेकर सिगरेट उसकी तरफ़ बढ़ा देता हूँ। वह अपनी दो अँगुलियों के बीच सिगरेट फंसाती है और अपने होठों पर रखकर एक क्विक कश लेती है। मैं उसके हाथों से सिगरेट लेते हुए ठिठक जाता हूँ। फिल्टर पर उसके होठों की छुअन को अपनी अँगुलियों में महसूस करता हूँ। अगला कश लेने के लिए उसे अपने होठों से लगाता हूँ।  आहा! ये किस चीज़ को किस चीज़ से मिला रहा हूँ मैं!  अचानक कोई साया ऑफिस से बाहर की तरफ़ आता दिखता है। हम दोनों आखिरी बार एक दूसरे को देखकर...

तुम बताओ

एक मुसाफिर जानता है  कि उसे कहाँ ठहरना है और कहाँ से कब चले जाना है एक टैक्सी वाले को मालूम है  कि किस मोड़ से इस शहर के बाहर जाकर भरा जा सकता है गिलास एक गिलहरी को भी इल्म है  कि पेड़ से गिरे बीज को कैसे कुतरना है पेड़ का पत्ता पत्ता जानता है  कि कब शाख से बिछड़ कर मिट्टी में मिल जाना है पंछी दिनभर काम करके  घर लौट कर करते हैं  अपनी चोंच साफ़  बादल अपनी आदत से मज़बूर  रोज बरसता है शहर पर,  थोड़ा थोड़ा  कि सब को मालूम है  अपने अपने ज़रूरी कामों के बारे में।  तुम बताओ,  तुम प्रेम के बारे में क्या जानते हो? 

सफ़ेद फूल के प्रिंट वाली कुर्ती

एक आहट फिर शाम की एक नग़मा फिर उसके नाम का कि जो कुछ भी है बस इतना ही है मेरे पास।  *** उस नीली अँगुलियों वाली लड़की के पास एक पिट्ठू बैग था। उसमें एक छोटा आईना और लिपस्टिक के साथ कुछ रंग भरे थे। अगले स्टेशन पर वह उतरने को खड़ी हुई तो एक हल्के धक्के से उसके बैग में रखे रंग बिखर गए।  उन रंगों के आपस में मिलने से आसमाँ के केनवास पर ये शाम खिल आई।  कभी मिलने के लिए तड़पते। कभी तड़प कर मिलते। तो कभी मिलकर फिर से मिलने के लिए। दिल को एक ढब चैन न आता। दिन बीतते गए। शामें किसी लंबी मेट्रो रेल की तरह शहर के ऊपर से गुज़रती रही। ज़िंदगी का कारवाँ चलता रहा।  हमने डीटीसी बसों में प्रेम किया। मेट्रो में बाहें डाले खड़े रहे। सड़क पर विदेशी जोड़ों की तरह रुक रुक कर कौने तलाशते रहे। हर पेड़, हर गली, हर मोड़ और हर वीकेंड को हमने अपने भीगे होठों से रंग दिया।  हम इश्क़ में शहर हो गए। हमने इस कदर इश्क़ किया। पर एक शहर भी किसी मोड़ पर ख़ुद से जुदा हो जाता है। जैसे बदरपुर बॉर्डर। जैसे मैं और तुम।  इन दिनों मेरे शहर में चाहतों का मौसम खिला है। दिल में बुझी हुई राख सुल...

तुम ❤️

मैं अपनी चेयर पर बैठा बाहर से आ रही ठंडी हवा को महसूस करता हूँ। दिन सामने खिड़की के काँच पर गिरते पानी की तरह फिसलता जाता है।  आहिस्ता आहिस्ता।  आँखों में नीम नींद भर आती है। बारिश के थमने तक ऑफिस की बाल्कनी पर शाम उतर आती है। बादलों की एक टीम आसमान में चलते चलते अचानक ठहर जाती है। जैसे कोई ऑफिस से घर जाती लड़की मार्केट में टंगे कपड़ों को देखकर ठहर जाती हैं।  बेवजह ही।  मैं अपना पीसी ऑफ करके मोबाईल चैक करता हूँ। उसमें किसी के उलाहने रखे हैं और रखी है एक रूठी हुई स्माइली। मैं मुस्कराता हूँ कि उसकी तल्खी से मौसम और भी दिलफरेब हो जाता है। मग़र।  उसको मुझसे शिकायत है कि मुझे ऑफिस से टाइम नहीं मिलता। मुझे उससे कहना है कि तुम्हारी याद से ही ये शाम खूबसूरत है।  तुम। ❤️

क्यूँ...

कभी कभी शाम का इंतजार दिन को बेहद लंबा कर देता है। हम ऑफिस के काम और जिंदगी के बीच बैलेंस बनाने की कशमकश में उलझे रहते हैं। हम थक जाते हैं। बेतहाशा। लगता है कि एक लंबी छुट्टी लेकर कहीं चले जाएं। मग़र यह नहीं सूझता कि कहां। कभी कभी।  एक शाम आकर सारी उलझनें बुहार देती है। घर लौटने की उम्मीद से शहर टिमटिमाने लगता है। बदन को सूकून आता है। मन गीत बुनने लगता है।  कि ये मौसम को अचानक क्या हो जाता है?  कभी कभी कोई इंतजार बेहद लंबा होता है। इतना कि हमें पता भी नहीं होता कि हम इंतजार में हैं। तुम अपने अंदर झाँकना और पूछना कि ये चुभन कैसी है? यूँ चुप चुप क्यूँ रहते हो, इस बैचैनी का सबब क्या है? मैं नहीं जान पाता कि मैं क्यूँ भटकता रहता हूँ एक कटी पतंग की तरह। शायद तुम जान पाओ।  दुआएँ। ❤️

तमाशा है सब...

मेरे नए दोस्त मेरे घर आए। उन्होंने कहा कि तुम कुछ नहीं कर सकोगे क्यूँकि तुम थोड़े अलग हो। आर्टिस्ट का यहाँ कोई फ्यूचर नहीं होता।  मैं यह सुनकर घबरा गया। मुझे पसीना आने लगा। अगले ही दिन से मैंने नौकरी ढूँढनी शुरू कर दी। एक सप्ताह बाद मैं एक अच्छी कंपनी में जॉब करने लगा।  मैं ख़ुश था। इस बात पर नहीं कि मुझे नौकरी मिल गई, इस बात के लिए कि वे लोग कोई नौकरी नहीं कर रहे थे पर मैं अब कर रहा था।  मुझे लगा वे लोग उदास होंगे। मैं उन्हें देखने उनमें से एक के घर गया। मैं चौंक गया कि वे सारे लोग एक साथ बैठे थे और कुछ बातें कर रहे थे। मुझे लगा शायद अपना अपना दुःख बांट रहे हैं आपस में।  मग़र नहीं। वे लोग मनाली जाने का प्लान बना रहे थे। उन्होंने मुझे देखते हुए कहा कि सॉरी यार, हम तुम्हें ले चलना चाहते हैं पर अब तो तुम जॉब करने लगे हो तो तुम तो जा नहीं पाओगे। और वे हँसने लगे।  मुझे लगा मेरे साथ धोखा हुआ है। मैं झेंप गया। मैंने बनावटी मुस्कान बिखरते हुए कहा कि अरे नहीं, मैं वैसे भी नहीं जाना चाहता, मुझे पसंद नहीं ये घूमना वूमना। वे लोग फ़िर हँसने लगे। ज़ोर ज़ोर से। मु...