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क्यूँ...

कभी कभी शाम का इंतजार दिन को बेहद लंबा कर देता है। हम ऑफिस के काम और जिंदगी के बीच बैलेंस बनाने की कशमकश में उलझे रहते हैं। हम थक जाते हैं। बेतहाशा। लगता है कि एक लंबी छुट्टी लेकर कहीं चले जाएं। मग़र यह नहीं सूझता कि कहां।
कभी कभी। 

एक शाम आकर सारी उलझनें बुहार देती है। घर लौटने की उम्मीद से शहर टिमटिमाने लगता है। बदन को सूकून आता है। मन गीत बुनने लगता है। 

कि ये मौसम को अचानक क्या हो जाता है? 

कभी कभी कोई इंतजार बेहद लंबा होता है। इतना कि हमें पता भी नहीं होता कि हम इंतजार में हैं।

तुम अपने अंदर झाँकना और पूछना कि ये चुभन कैसी है? यूँ चुप चुप क्यूँ रहते हो, इस बैचैनी का सबब क्या है?

मैं नहीं जान पाता कि मैं क्यूँ भटकता रहता हूँ एक कटी पतंग की तरह। शायद तुम जान पाओ। 

दुआएँ। ❤️

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हो सकता है

 मौसम विभाग ने कहा था की दस तारिख को बारिश होगी  उसने कहा था की दस तारीख को मिलेंगे  न बारिश हुई न वह मिलने आई।  हो सकता है इन दो बातों का एक दूजे से कोई लेना देना न हो। 

जैसे...

वॉयलिन की कोई उदास धुन बजाते हुए, जैसे मर गया हो कोई संगीतकार। जैसे कोई बूढ़ा ठहर गया हो अपनी आखिरी खुराक खाने से पहले ही। जैसे मुस्कराते हुए हिरन की गर्दन काट दी हो शिकारी ने और वह भूल गया हो आखिरी तड़प के दर्द को चेहरे पर लाना।  जैसे पुकारा हो तुमने मेरा नाम आखिरी बार जैसे मैं कर रहा हूँ इंतजार तुमसे मिलने का,  आखिरी बार।

ख़यालों के कुछ टुकड़े

एक मजदूर प्रेमी अपने महीने भर की तनख्वाह से अपनी महबूबा के लिए एक चाँद लाया. और महबूबा चाँद पर बैठकर किसी शहजादे के पास चली गई. *** किताबें इंसान को बिना पिए ही शराबी बना देती है। *** कभी कभी मैं महसूस करता हूँ कि मैं सर्द हवा का एक झोंका हूँ. जो हर सुबह एक नीली तितली की पीठ पर बैठकर अपने काम पर जाता है. और शाम को लौटता है एक बादल बनकर. *** ऑफिस का घर से दूर होना कितना मजेदार है! 2 घंटे की भीड़ भरी तन्हाई में कितना कुछ लिखा जा सकता है। *** इस दुनिया में हर चीज एक करिश्मा है. यह करिश्मा ही है कि मैं ऑफिस में कीबोर्ड पर टिक टिक करते वक़्त यह महसूस करता हूँ कि मैं अपनी अपनी प्रेमिका को ख़त लिख रहा हूँ. ख़त, जो हर शाम अधूरा रह जाता है. ***