कभी कभी शाम का इंतजार दिन को बेहद लंबा कर देता है। हम ऑफिस के काम और जिंदगी के बीच बैलेंस बनाने की कशमकश में उलझे रहते हैं। हम थक जाते हैं। बेतहाशा। लगता है कि एक लंबी छुट्टी लेकर कहीं चले जाएं। मग़र यह नहीं सूझता कि कहां।
कभी कभी।
एक शाम आकर सारी उलझनें बुहार देती है। घर लौटने की उम्मीद से शहर टिमटिमाने लगता है। बदन को सूकून आता है। मन गीत बुनने लगता है।
कि ये मौसम को अचानक क्या हो जाता है?
कभी कभी कोई इंतजार बेहद लंबा होता है। इतना कि हमें पता भी नहीं होता कि हम इंतजार में हैं।
तुम अपने अंदर झाँकना और पूछना कि ये चुभन कैसी है? यूँ चुप चुप क्यूँ रहते हो, इस बैचैनी का सबब क्या है?
मैं नहीं जान पाता कि मैं क्यूँ भटकता रहता हूँ एक कटी पतंग की तरह। शायद तुम जान पाओ।
दुआएँ। ❤️
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