एक आहट फिर शाम की
एक नग़मा फिर उसके नाम का
कि जो कुछ भी है बस इतना ही है मेरे पास।
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उस नीली अँगुलियों वाली लड़की के पास एक पिट्ठू बैग था। उसमें एक छोटा आईना और लिपस्टिक के साथ कुछ रंग भरे थे। अगले स्टेशन पर वह उतरने को खड़ी हुई तो एक हल्के धक्के से उसके बैग में रखे रंग बिखर गए।
उन रंगों के आपस में मिलने से आसमाँ के केनवास पर ये शाम खिल आई।
कभी मिलने के लिए तड़पते। कभी तड़प कर मिलते। तो कभी मिलकर फिर से मिलने के लिए। दिल को एक ढब चैन न आता। दिन बीतते गए। शामें किसी लंबी मेट्रो रेल की तरह शहर के ऊपर से गुज़रती रही। ज़िंदगी का कारवाँ चलता रहा।
हमने डीटीसी बसों में प्रेम किया। मेट्रो में बाहें डाले खड़े रहे। सड़क पर विदेशी जोड़ों की तरह रुक रुक कर कौने तलाशते रहे। हर पेड़, हर गली, हर मोड़ और हर वीकेंड को हमने अपने भीगे होठों से रंग दिया।
हम इश्क़ में शहर हो गए। हमने इस कदर इश्क़ किया। पर एक शहर भी किसी मोड़ पर ख़ुद से जुदा हो जाता है। जैसे बदरपुर बॉर्डर। जैसे मैं और तुम।
इन दिनों मेरे शहर में चाहतों का मौसम खिला है। दिल में बुझी हुई राख सुलगने लगी है। आँखें फ़िर इंतजार के गीत बुनने लगी हैं। ख्वाहिश है कि बीते दिनों की तरह किसी शाम तुम उस सेंट्रल पार्क में मिलो और अपने हाथों से मेरा हाथ छोड़े बिना कहो कि चलो घर चलें।
वे दिन...
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सामने वाली सीट पर सफ़ेद फ़ूलों के प्रिंट वाली एक गुलाबी कुर्ती पहने एक लड़की बैठी है। मुझे उसके पीछे खिड़की पर लगे शीशे पर दिख रहा है कि उसके इन्स्टाग्राम में कोई पोस्ट कह रही है कि दुनिया में 2027 तक एक स्पेस-होटल खुलेगा? क्या वह वहाँ जाने का सोच रही होगी? अगर मैं कहूँ तो क्या वह मुझे अपने साथ ले जाएगी?
काश मैंने पूछ लिया होता उससे।
काश...
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