Skip to main content

सफ़ेद फूल के प्रिंट वाली कुर्ती


एक आहट फिर शाम की
एक नग़मा फिर उसके नाम का

कि जो कुछ भी है बस इतना ही है मेरे पास। 

***

उस नीली अँगुलियों वाली लड़की के पास एक पिट्ठू बैग था। उसमें एक छोटा आईना और लिपस्टिक के साथ कुछ रंग भरे थे। अगले स्टेशन पर वह उतरने को खड़ी हुई तो एक हल्के धक्के से उसके बैग में रखे रंग बिखर गए। 

उन रंगों के आपस में मिलने से आसमाँ के केनवास पर ये शाम खिल आई। 

कभी मिलने के लिए तड़पते। कभी तड़प कर मिलते। तो कभी मिलकर फिर से मिलने के लिए। दिल को एक ढब चैन न आता। दिन बीतते गए। शामें किसी लंबी मेट्रो रेल की तरह शहर के ऊपर से गुज़रती रही। ज़िंदगी का कारवाँ चलता रहा। 

हमने डीटीसी बसों में प्रेम किया। मेट्रो में बाहें डाले खड़े रहे। सड़क पर विदेशी जोड़ों की तरह रुक रुक कर कौने तलाशते रहे। हर पेड़, हर गली, हर मोड़ और हर वीकेंड को हमने अपने भीगे होठों से रंग दिया। 

हम इश्क़ में शहर हो गए। हमने इस कदर इश्क़ किया। पर एक शहर भी किसी मोड़ पर ख़ुद से जुदा हो जाता है। जैसे बदरपुर बॉर्डर। जैसे मैं और तुम। 

इन दिनों मेरे शहर में चाहतों का मौसम खिला है। दिल में बुझी हुई राख सुलगने लगी है। आँखें फ़िर इंतजार के गीत बुनने लगी हैं। ख्वाहिश है कि बीते दिनों की तरह किसी शाम तुम उस सेंट्रल पार्क में मिलो और अपने हाथों से मेरा हाथ छोड़े बिना कहो कि चलो घर चलें। 

वे दिन... 

***

सामने वाली सीट पर सफ़ेद फ़ूलों के प्रिंट वाली एक गुलाबी कुर्ती पहने एक लड़की बैठी है। मुझे उसके पीछे खिड़की पर लगे शीशे पर दिख रहा है कि उसके इन्स्टाग्राम में कोई पोस्ट कह रही है कि दुनिया में 2027 तक एक स्पेस-होटल खुलेगा? क्या वह वहाँ जाने का सोच रही होगी? अगर मैं कहूँ तो क्या वह मुझे अपने साथ ले जाएगी?

काश मैंने पूछ लिया होता उससे। 

काश...

Comments

Popular posts from this blog

हो सकता है

 मौसम विभाग ने कहा था की दस तारिख को बारिश होगी  उसने कहा था की दस तारीख को मिलेंगे  न बारिश हुई न वह मिलने आई।  हो सकता है इन दो बातों का एक दूजे से कोई लेना देना न हो। 

जैसे...

वॉयलिन की कोई उदास धुन बजाते हुए, जैसे मर गया हो कोई संगीतकार। जैसे कोई बूढ़ा ठहर गया हो अपनी आखिरी खुराक खाने से पहले ही। जैसे मुस्कराते हुए हिरन की गर्दन काट दी हो शिकारी ने और वह भूल गया हो आखिरी तड़प के दर्द को चेहरे पर लाना।  जैसे पुकारा हो तुमने मेरा नाम आखिरी बार जैसे मैं कर रहा हूँ इंतजार तुमसे मिलने का,  आखिरी बार।

वे दिन....

मैं अक्सर काम के सिलसिले में उसके घर की गली से गुजरता हूँ तो ख्याल आता है कि कहीं वह एक दफ़ा दिख जाए तो दिल को चैन आए. मगर वह तो ऐसे ग़ायब है कि कहीं कोई इशारा नहीं मिलता. चाहत है कि उससे मुलाकातों का सिलसिला फ़िर से शुरू हो. भले ही वह कुछ बोले न पर मेरे साथ मुझसे सटकर तो बैठे. जैसे कभी बैठे थे हम राजीव चौक के सेंट्रल पार्क में. एक दूजे में खोए मगर इक-दूजे से ही बे-ख़बर. वे दिन.... ♥