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तुम ❤️


मैं अपनी चेयर पर बैठा बाहर से आ रही ठंडी हवा को महसूस करता हूँ। दिन सामने खिड़की के काँच पर गिरते पानी की तरह फिसलता जाता है। 

आहिस्ता आहिस्ता। 

आँखों में नीम नींद भर आती है। बारिश के थमने तक ऑफिस की बाल्कनी पर शाम उतर आती है। बादलों की एक टीम आसमान में चलते चलते अचानक ठहर जाती है। जैसे कोई ऑफिस से घर जाती लड़की मार्केट में टंगे कपड़ों को देखकर ठहर जाती हैं। 

बेवजह ही। 

मैं अपना पीसी ऑफ करके मोबाईल चैक करता हूँ। उसमें किसी के उलाहने रखे हैं और रखी है एक रूठी हुई स्माइली। मैं मुस्कराता हूँ कि उसकी तल्खी से मौसम और भी दिलफरेब हो जाता है।

मग़र। 

उसको मुझसे शिकायत है कि मुझे ऑफिस से टाइम नहीं मिलता। मुझे उससे कहना है कि तुम्हारी याद से ही ये शाम खूबसूरत है। 

तुम। ❤️

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हो सकता है

 मौसम विभाग ने कहा था की दस तारिख को बारिश होगी  उसने कहा था की दस तारीख को मिलेंगे  न बारिश हुई न वह मिलने आई।  हो सकता है इन दो बातों का एक दूजे से कोई लेना देना न हो। 

जैसे...

वॉयलिन की कोई उदास धुन बजाते हुए, जैसे मर गया हो कोई संगीतकार। जैसे कोई बूढ़ा ठहर गया हो अपनी आखिरी खुराक खाने से पहले ही। जैसे मुस्कराते हुए हिरन की गर्दन काट दी हो शिकारी ने और वह भूल गया हो आखिरी तड़प के दर्द को चेहरे पर लाना।  जैसे पुकारा हो तुमने मेरा नाम आखिरी बार जैसे मैं कर रहा हूँ इंतजार तुमसे मिलने का,  आखिरी बार।

वे दिन....

मैं अक्सर काम के सिलसिले में उसके घर की गली से गुजरता हूँ तो ख्याल आता है कि कहीं वह एक दफ़ा दिख जाए तो दिल को चैन आए. मगर वह तो ऐसे ग़ायब है कि कहीं कोई इशारा नहीं मिलता. चाहत है कि उससे मुलाकातों का सिलसिला फ़िर से शुरू हो. भले ही वह कुछ बोले न पर मेरे साथ मुझसे सटकर तो बैठे. जैसे कभी बैठे थे हम राजीव चौक के सेंट्रल पार्क में. एक दूजे में खोए मगर इक-दूजे से ही बे-ख़बर. वे दिन.... ♥