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ये कशिश कैसी थी?

अचानक कोई आवाज़ सुनाई पड़ती है। जैसे कुछ टूटकर गिर बिखर गया हो। मैं इधर उधर देखने लगता हूँ। सबकुछ वैसे ही है जैसे पहले था।
फ़िर ये आवाज कैसी थी?

मैं ख़ुद को अपनी चेयर पर छोड़कर ऑफिस से बाहर आ जाता हूँ। दोनों हाथों से अपनी जेबों को टटोलता हूँ। दो बार टक टक की आवाज के बाद सिगरेट सुलगने लगती है। एक अजीब सा हल्कापन दिमाग़ पर तारी हो जाता है। मैं रुई के फाहे सा हल्का हो जाता हूँ। 

सड़क पर धूप का आईना फ़ैला हुआ है। एक लड़का एक लड़की को मना रहा है। लड़की बार बार हाथ छिटक कर आगे बढ़ जाती है। 

वह उन्हें देखकर मुस्कराती है। 

मैं एक लंबा कश लेकर सिगरेट उसकी तरफ़ बढ़ा देता हूँ। वह अपनी दो अँगुलियों के बीच सिगरेट फंसाती है और अपने होठों पर रखकर एक क्विक कश लेती है।

मैं उसके हाथों से सिगरेट लेते हुए ठिठक जाता हूँ। फिल्टर पर उसके होठों की छुअन को अपनी अँगुलियों में महसूस करता हूँ। अगला कश लेने के लिए उसे अपने होठों से लगाता हूँ। 

आहा! ये किस चीज़ को किस चीज़ से मिला रहा हूँ मैं! 

अचानक कोई साया ऑफिस से बाहर की तरफ़ आता दिखता है। हम दोनों आखिरी बार एक दूसरे को देखकर मुस्कराते हैं। हवा का झोंका मेरे गालों को छूता हुआ गुज़र जाता है। मैं वापस आकर अपनी कुर्सी पर बैठ जाता हूँ।

दिन की सिगरेट से कोई एक लंबा कश खींच लेता है। सिगरेट बूझकर शाम हो जाती है। आसमाँ पर चाँद मुस्कुराता है।

मैं ब्लॉग लिखते हुए अचानक ठहर जाता हूँ। जैसे किसी ने पीछे से कंधे पर हाथ रख दिया हो। मैं मुस्कुराता हूँ। अपनी अँगुलियों को सूँघ कर कुछ कन्फर्म करना चाहता हूँ। एक तीखी कसैली गंध दिमाग़ को भारी कर देती है या हल्का मालूम नहीं।

सड़क के किनारे चलता हुआ मैं सोचता हूँ कि बालकनी में घुली वो कशिश कैसी थी? वो लड़का हवा से बातें कैसे कर रहा था? मैं अपनी अँगुलियों को फ़िर से सूँघता हूँ और अपनी नादानी पर मुस्कुराता हूँ।

#writing #selfmusing #Rohankidiary

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