पता नहीं क्या होता.
एक कहानी लिखने के बारे में सोचना मुझे रोमांच से भर देता है. कैसे एक बीज में छुपा होता है एक पेड़? कैसे बूँद बूँद बारिश में छुपा होता है समंदर? कभी सोचा है तुमने? मैंने सोचा. इसलिए शब्दों से उगा ली कई सारी कहानियाँ.
इन दिनों मैं हॉस्पिटल के चक्कर काट रहा हूँ. तरह-तरह के मरीजों को देखकर आभास होता है कि वक्त तेज़ी से बढ़ता जा रहा है मग़र जिंदगी ठहर सी गई है. एक तेज चुभन मेरी रीढ़ की हड्डी से होकर गुजर जाती है. हो सकता है तुम इसे मेरा कमीनापन कहो मग़र मुझे इसमें भी एक कहानी दिखाई देने लगती है. मैं खुद को इसी हॉस्पिटल के किसी बिस्तर पर दीवार का सहारा लिए बैठे देखता हूँ. मैं किस बीमारी के चलते यहाँ आया मुझे मालूम नहीं मग़र मैं इतना स्वस्थ हो चुका हूँ कि मेरे हाथ में मेरा लैपटॉप है और दिमाग़ में कई सारी कहानियाँ.
मैं अक्सर सोचने लगता हूँ कि हम सब किसी कहानी के कैरेक्टर्स हैं. सब अपना अपना रोल अदा करते हैं और आगे बढ़ जाते हैं. हो सकता है तुमने भी कभी ऑफिस के कीबोर्ड में उँगलियाँ फंसाये ऐसा सोचा हो.
मैंने ये भी सोचा है अक्सर, कि तुम और मैं एक कहानी में इतनी रात गए जाग रहे हैं. मैं तुम्हें मिलने के लिए मना रहा हूँ और तुम मुझसे बचने की जुगत में लगी हो. आखिर में मैं जीत जाता हूँ और तुम 'ओह नो' वाली स्माइली भेजते हुए कहती हो ओके.
ये कहानी कौन लिख रहा है? ये दुनिया क्या चीज़ है? ये जिंदगी क्या शै है?
तुम कौन हो मैं कौन हूँ? ये मेरा इतनी रात को लिखना क्या है? और तुम्हारा इसे पढ़ना क्या है?
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