दिन का आखिरी पहर था
ढल गया।
रेहड़ी वालों ने शाम के स्वागत में
बिछा ली मूँगफलियाँ।
एक भीड़ लोगों की
बढ़ने लगी मार्केट की जानिब।
फेरी वालों ने दी आवाजें ग्राहकों को
दूर से
जैसे कोई पुकारे नाम महबूब का
सड़क के उस छोर से।
बादलों की एक शैतान टोली ने
शहर पर डाल दी डकैत
हवा ने फूँक मारकर बिछा दी चादर धूल की
दूर दूर तक।
लोग परेशान होकर लौटने लगे
अपने अपने घरों को।
मैं टैक्सी में बैठ जब ये देख रहा था
तब मास्क के पीछे छुपी उसकी आँखों ने कहा कि मैं हवा हूँ और तुम बादल हो
हो जाने दो बरबाद इस शहर को।
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