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हो जाने दो बरबाद


दिन का आखिरी पहर था
ढल गया।

रेहड़ी वालों ने शाम के स्वागत में 
बिछा ली मूँगफलियाँ।

एक भीड़ लोगों की
बढ़ने लगी मार्केट की जानिब।  

फेरी वालों ने दी आवाजें ग्राहकों को
दूर से
जैसे कोई पुकारे नाम महबूब का 
सड़क के उस छोर से। 

बादलों की एक शैतान टोली ने
शहर पर डाल दी डकैत
हवा ने फूँक मारकर बिछा दी चादर धूल की
दूर दूर तक।

लोग परेशान होकर लौटने लगे
अपने अपने घरों को।

मैं टैक्सी में बैठ जब ये देख रहा था
तब मास्क के पीछे छुपी उसकी आँखों ने कहा कि मैं हवा हूँ और तुम बादल हो

हो जाने दो बरबाद इस शहर को। 

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हो सकता है

 मौसम विभाग ने कहा था की दस तारिख को बारिश होगी  उसने कहा था की दस तारीख को मिलेंगे  न बारिश हुई न वह मिलने आई।  हो सकता है इन दो बातों का एक दूजे से कोई लेना देना न हो। 

जैसे...

वॉयलिन की कोई उदास धुन बजाते हुए, जैसे मर गया हो कोई संगीतकार। जैसे कोई बूढ़ा ठहर गया हो अपनी आखिरी खुराक खाने से पहले ही। जैसे मुस्कराते हुए हिरन की गर्दन काट दी हो शिकारी ने और वह भूल गया हो आखिरी तड़प के दर्द को चेहरे पर लाना।  जैसे पुकारा हो तुमने मेरा नाम आखिरी बार जैसे मैं कर रहा हूँ इंतजार तुमसे मिलने का,  आखिरी बार।

वे दिन....

मैं अक्सर काम के सिलसिले में उसके घर की गली से गुजरता हूँ तो ख्याल आता है कि कहीं वह एक दफ़ा दिख जाए तो दिल को चैन आए. मगर वह तो ऐसे ग़ायब है कि कहीं कोई इशारा नहीं मिलता. चाहत है कि उससे मुलाकातों का सिलसिला फ़िर से शुरू हो. भले ही वह कुछ बोले न पर मेरे साथ मुझसे सटकर तो बैठे. जैसे कभी बैठे थे हम राजीव चौक के सेंट्रल पार्क में. एक दूजे में खोए मगर इक-दूजे से ही बे-ख़बर. वे दिन.... ♥