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तुम हो कि...


जादूगर मूँगफली वाले की तरह अपने पिटारे से तरह-तरह के अचम्भे निकालता जाता। लोग कपड़े की दुकान के आगे खड़े पुतले की तरह देखते जाते। लोगों को लगता कि वे जादू के सम्मोहन में है। मग़र असल में यह शाम थी जो उनकी आँखों में तिलिस्म फूँक रही थी। 

मैं इस मायाजाल में नहीं फंसता हूँ कि मेरी जेबों में तुम्हारे होंठो के गुलाबी फाहे रखे हैं। दिल में तुम्हारे बालों में फंसे क्लेचर की चुभन अटकी हुई है। गर्दन में तुम्हारे दाँतों की टीस है जो मुझे इस मायावी दुनिया से मुक्त रखती है।

मैं एक शैतान हूँ और तुम शैतान की प्रेमिका।

मेरे यह कहते ही तुम मेरे गालों पर अपने दांत गड़ा देती हो। हरी नीली बसें एक्सीलेटर छोड़कर ब्रेक लगा देती हैं। ट्राफिक पुलिस वाला सर पे हाथ रखकर बैठ जाता है एटीएम के बाहर बने फुटपाथ पर। मूँगफली वाला देखने लगता है दूसरी तरफ़ जैसे उसने कुछ देखा ही न हो अभी अभी। 

अभी तो सर्दियाँ शुरू भी नहीं हुई और तुम हो कि ओस की तरह गिरने लगी हो मुझपर। रहम करो कि बरबाद हो जाएगा ये शहर भी मेरी तरह। 

मैं और तुम। जैसे कोई कहानी। हैं भी और नहीं भी हैं हम।

चियर्स। 

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हो सकता है

 मौसम विभाग ने कहा था की दस तारिख को बारिश होगी  उसने कहा था की दस तारीख को मिलेंगे  न बारिश हुई न वह मिलने आई।  हो सकता है इन दो बातों का एक दूजे से कोई लेना देना न हो। 

जैसे...

वॉयलिन की कोई उदास धुन बजाते हुए, जैसे मर गया हो कोई संगीतकार। जैसे कोई बूढ़ा ठहर गया हो अपनी आखिरी खुराक खाने से पहले ही। जैसे मुस्कराते हुए हिरन की गर्दन काट दी हो शिकारी ने और वह भूल गया हो आखिरी तड़प के दर्द को चेहरे पर लाना।  जैसे पुकारा हो तुमने मेरा नाम आखिरी बार जैसे मैं कर रहा हूँ इंतजार तुमसे मिलने का,  आखिरी बार।

वे दिन....

मैं अक्सर काम के सिलसिले में उसके घर की गली से गुजरता हूँ तो ख्याल आता है कि कहीं वह एक दफ़ा दिख जाए तो दिल को चैन आए. मगर वह तो ऐसे ग़ायब है कि कहीं कोई इशारा नहीं मिलता. चाहत है कि उससे मुलाकातों का सिलसिला फ़िर से शुरू हो. भले ही वह कुछ बोले न पर मेरे साथ मुझसे सटकर तो बैठे. जैसे कभी बैठे थे हम राजीव चौक के सेंट्रल पार्क में. एक दूजे में खोए मगर इक-दूजे से ही बे-ख़बर. वे दिन.... ♥