मग़र क्या मालूम था कि दिन भर औंधे पड़े प्याले की तरह कुर्सी में पड़े रहेंगे और कीबोर्ड पर अंगुलियाँ घुमाते रहेंगे। कब सोचा था कि उसकी बाहों को छोड़ दीवारों से सिर टिकाना पड़ेगा।
जिंदगी न हुई कच्ची उम्र का प्रेम हो गया। साथ बैठे हैं मग़र समझ नहीं आ रहा कि क्या करें।
मग़र कोई नी।
ए जिंदगी, तुम जैसी भी हो बेहद सुंदर हो। लव यू।
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