रेल्वे फाटक के सिग्नल की तरह
दिल पता नहीं किसके इंतजार में खड़ा रहता है,
हसरतों की सड़क पर।
***
आजकल दिन चुपके से गुजर जाते हैं। शामें आहिस्ता से रात के पहलू में सिमट जाती हैं। मैं बस की पिछली सीट पर बैठा ये सोच रहा होता हूँ, कि हवा मेरे चेहरे पर लिखती जाती है कोई भीगा नग़मा।
मैं आसमान में घर लौटते पंछियों से पूछता हूँ कि आज क्या जिया? कैसे पता करोगे कि ये दिन सिर्फ गुज़ारा भर है या जिया भी है?
पेड़ से पत्ते गिरते हुए ठहर जाते हैं। पंछी चहक कर भूल जाते हैं अपनी चोंच बंद करना। ऑफिस की पास वाली गली में गुज़रते हुए मज़दूर फेंक देते हैं अपनी आधी बची सिगरेटों को। लड़कियां तोड़ देती हैं अपने बैग में छुपाया हुआ आईना।
मैं ख़ुद से पूछता हूँ कि क्या बात है डियर, ये कैसे सवाल कर रहे हो? मन किसी डांट खाते बच्चे की तरह चुप खड़ा रहता है। दिल में कई हसरतें मुट्ठी से फिसलती रेत की तरह बिखर जाती हैं।
जब कोई जवाब नहीं मिलता तो मैं लिखने लगता हूँ ये छोटी छोटी बातें। एक झुंड पंछियों का शोर करता हुआ गुज़र जाता है शहर के ऊपर से।
हसरतें। ख़्वाब। ज़िंदगी। शाम। तुम। 🤍
#poetry #instadiary #stories #Rohankidiary #eveningthoughts #railwayphotography #selfmusing
Comments
Post a Comment