Skip to main content

इश्क़ में शहर होना

वे दोनों पीरागढ़ी चौक पर एक दिन अचानक मिले. उसके बाद वे हर रविवार यहाँ नियम से मिलने लगे.

वह अपनी पल्सर पर हैलमेट लगाए पीरागढ़ी के मैन-स्टैंड पर ठीक दस बजे उसका इंतजार करता. वह अपने चेहरे पर स्कार्फ बांधे हमेशा ही लेट आती. उसे पॉल्यूशन से ज्यादा डर दिल्ली के कौने-कौने में बसे उसके रिश्तेदारों का होता. कहीं कोई देख ले तो शामत ही आ जाए.

पीरागढ़ी चौक से वे आजादपुर की तरफ़ चल देते और उनकी बातों का सिलसिला चल पड़ता. ट्रक और बसों के भारी भरकम हॉर्न के दर्दनाक शोर की वजह से उन्हें अपनी बातों को कई बार और तेज़ आवाज़ में कहना पड़ता.

दोनों चाहते कि वे कहीं रुककर थोड़ी देर कुछ बात कर लें. एक दूजे से पूछ लें कि तुम कैसे हो? मग़र दिल्ली जैसे शहर में भी उनके लिए दो पल आराम से बात करने के लिए जगह न होती. लोग उनके इर्दगिर्द इकठ्ठे हो जाते और उन्हें घूरते जो उन्हें बड़ा अनकंफर्टेबल लगता.

दो सालों से वे इसी तरह मिलते और अपने ख्यालों में इश्क़ का शहर बुनते रहते. आजादपुर से आगे जाते हुए नॉर्थ कैम्पस में कुछ देर साथ चाय पीने के लिए ठहरते और फ़िर उसी पल्सर में एक दूजे से चिपके बातें करते हुए इश्क़ में शहर होते रहते.

Comments

Popular posts from this blog

हो सकता है

 मौसम विभाग ने कहा था की दस तारिख को बारिश होगी  उसने कहा था की दस तारीख को मिलेंगे  न बारिश हुई न वह मिलने आई।  हो सकता है इन दो बातों का एक दूजे से कोई लेना देना न हो। 

जैसे...

वॉयलिन की कोई उदास धुन बजाते हुए, जैसे मर गया हो कोई संगीतकार। जैसे कोई बूढ़ा ठहर गया हो अपनी आखिरी खुराक खाने से पहले ही। जैसे मुस्कराते हुए हिरन की गर्दन काट दी हो शिकारी ने और वह भूल गया हो आखिरी तड़प के दर्द को चेहरे पर लाना।  जैसे पुकारा हो तुमने मेरा नाम आखिरी बार जैसे मैं कर रहा हूँ इंतजार तुमसे मिलने का,  आखिरी बार।

वे दिन....

मैं अक्सर काम के सिलसिले में उसके घर की गली से गुजरता हूँ तो ख्याल आता है कि कहीं वह एक दफ़ा दिख जाए तो दिल को चैन आए. मगर वह तो ऐसे ग़ायब है कि कहीं कोई इशारा नहीं मिलता. चाहत है कि उससे मुलाकातों का सिलसिला फ़िर से शुरू हो. भले ही वह कुछ बोले न पर मेरे साथ मुझसे सटकर तो बैठे. जैसे कभी बैठे थे हम राजीव चौक के सेंट्रल पार्क में. एक दूजे में खोए मगर इक-दूजे से ही बे-ख़बर. वे दिन.... ♥