वह अपनी पल्सर पर हैलमेट लगाए पीरागढ़ी के मैन-स्टैंड पर ठीक दस बजे उसका इंतजार करता. वह अपने चेहरे पर स्कार्फ बांधे हमेशा ही लेट आती. उसे पॉल्यूशन से ज्यादा डर दिल्ली के कौने-कौने में बसे उसके रिश्तेदारों का होता. कहीं कोई देख ले तो शामत ही आ जाए.
पीरागढ़ी चौक से वे आजादपुर की तरफ़ चल देते और उनकी बातों का सिलसिला चल पड़ता. ट्रक और बसों के भारी भरकम हॉर्न के दर्दनाक शोर की वजह से उन्हें अपनी बातों को कई बार और तेज़ आवाज़ में कहना पड़ता.
दोनों चाहते कि वे कहीं रुककर थोड़ी देर कुछ बात कर लें. एक दूजे से पूछ लें कि तुम कैसे हो? मग़र दिल्ली जैसे शहर में भी उनके लिए दो पल आराम से बात करने के लिए जगह न होती. लोग उनके इर्दगिर्द इकठ्ठे हो जाते और उन्हें घूरते जो उन्हें बड़ा अनकंफर्टेबल लगता.
दो सालों से वे इसी तरह मिलते और अपने ख्यालों में इश्क़ का शहर बुनते रहते. आजादपुर से आगे जाते हुए नॉर्थ कैम्पस में कुछ देर साथ चाय पीने के लिए ठहरते और फ़िर उसी पल्सर में एक दूजे से चिपके बातें करते हुए इश्क़ में शहर होते रहते.

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