बेमौसम आई बरसात की तरह प्रेम हमारे सामने से निकल जाता है। हम भीगना चाहते हैं मग़र आदतन छाता लेकर खड़े हो जाते हैं। बरसात चली जाती है और तब हम खुद को कोसते हैं कि क्या खड़े खड़े डर रहे थे और देखते रह गए? क्यूँ न भीग गए? वह क्या था जिसने हमें रोके रखा?
प्रेम जिससे हो जाए उससे करो। मग़र साथ उसके रहो जो तुम्हारी जिम्मेदारी उठा पाए। यह हमें बचपन से ही सिखाया जाता है। क्या उम्र और समझ बढ़ने के साथ-साथ प्रेम बुझ जाता है? या फिर प्रेम छूट जाने पर हम बड़ा और समझदार होना महसूस कर पाते हैं? हम दोनों ही इन सवालों का जवाब नहीं तय कर पाए।
इसलिए तुम वहाँ हो और मैं यहाँ हूँ।
तुम मुझे भूल जाने को मजबूर हो,
मैं तुम्हें याद आने को मजबूर हूँ।
क्या कीजै?
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