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क्या कीजै


बेमौसम आई बरसात की तरह प्रेम हमारे सामने से निकल जाता है। हम भीगना चाहते हैं मग़र आदतन छाता लेकर खड़े हो जाते हैं। बरसात चली जाती है और तब हम खुद को कोसते हैं कि क्या खड़े खड़े डर रहे थे और देखते रह गए? क्यूँ न भीग गए? वह क्या था जिसने हमें रोके रखा? 

प्रेम जिससे हो जाए उससे करो। मग़र साथ उसके रहो जो तुम्हारी जिम्मेदारी उठा पाए। यह हमें बचपन से ही सिखाया जाता है। क्या उम्र और समझ बढ़ने के साथ-साथ प्रेम बुझ जाता है? या फिर प्रेम छूट जाने पर हम बड़ा और समझदार होना महसूस कर पाते हैं? हम दोनों ही इन सवालों का जवाब नहीं तय कर पाए। 

इसलिए तुम वहाँ हो और मैं यहाँ हूँ। 

तुम मुझे भूल जाने को मजबूर हो, 
मैं तुम्हें याद आने को मजबूर हूँ। 

क्या कीजै?

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जैसे...

वॉयलिन की कोई उदास धुन बजाते हुए, जैसे मर गया हो कोई संगीतकार। जैसे कोई बूढ़ा ठहर गया हो अपनी आखिरी खुराक खाने से पहले ही। जैसे मुस्कराते हुए हिरन की गर्दन काट दी हो शिकारी ने और वह भूल गया हो आखिरी तड़प के दर्द को चेहरे पर लाना।  जैसे पुकारा हो तुमने मेरा नाम आखिरी बार जैसे मैं कर रहा हूँ इंतजार तुमसे मिलने का,  आखिरी बार।

हो सकता है

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ख़यालों के कुछ टुकड़े

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