सब कुछ भूल जाता हूँ मैं,
इक तुम्हारा नाम याद आते ही।
मैंने सुख की शक्ल में कुछ दुःख जेबों में भर लिए थे। या हो सकता है सुख के बीच छिपे दुःख उठा लिए हो, अनजाने ही। जैसे मैं कई बार मूँगफली के बीच छिलके उठा लिया करता हूँ।
उन दुखों को बीन कर मैंने रख दिया है कालीन के नीचे। कि मैं नहीं बाँटना चाहता उन्हें किसी के साथ। मैं बस एक सुख चाहता हूँ। एक भरे पेड़ जितना घना सुख।
जैसे काश तुम होती मेरे पहलू में तो मैं यूँ लिख ना रहा होता ये बेवजह की बात। मैं तुम्हें अपने दुःख सुनाता जाता और चूमता जाता तुम्हारे नर्म गुलाबी गालों को। तुम अपनी आँखें बंद कर लेती। खिड़की पर बैठी बिल्ली चाँद को बुझा देती। रात ढंक लेती खुद को रज़ाई से। और सुबह भूल जाती जागना।
इससे बड़ा सुख और क्या होगा कि किसी सुबह मैं जागूँ गहरी नींद से और तुम मेरी बाहों में लिपटी हो।
तुम मग़र उदास वहाँ,
मैं भी हूँ तन्हा यहाँ।
बस दूरियाँ हैं हमारे दरमियाँ।
बस दूरियाँ, ओ जानाँ....
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