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कब...


खिड़की से हवा का झोंका रह रह कर आता। वह हर झोंके पर खिड़की के पल्लू को तह करता। ब्रश से स्ट्रोक तो इतने अच्छे लगा रहा था कि जैसे अपने अतीत को रंग रहा हो। मुझे तो जानबूझकर भटका हुआ रेल का कोई डिब्बा लगता है वो। 

खिड़की पर ब्रश से स्ट्रोक मारते मारते पता नहीं किसके ख्यालों में खो जाता है। हर बार जब ब्रश कलर की छोटी बाल्टी में डुबोता है, होंठ गोल करके पता नहीं कौन सी नज़्म प्ले करता है ये। खिड़की के पार छत पर कोई काजल का पर्दा भी नहीं है कि जिसके पार वह अपने होंठों की धुन पहुँचाना चाहता हो। मुझे तो सच में, बड़ा अज़ीब लड़का लग रहा है। 

पंखा बंद कर रखा है इतनी गर्मी में। कहता है पसीना न आए तो लगता ही नहीं कि दिन बीत रहा है। अपने माथे पर आए हर पसीने की बूँद को अँगुलियों से इतनी नफ़ासत से संभाल कर ख़र्च करता है जैसे यही उसकी कमाई हो। शायद है भी। 

जब उसे कहा गया कि काम छोड़ो और चाय पी लो, तो इतनी ख़ुशी ख़ुशी सारा काम फ़ेंक कर बैठ गया जैसे किसी बच्चे को कह दो कि काम बंद करो तो वह अपनी पेंसिल और नोटबुक एक तरफ़ फ़ेंक देता है। कितना बचपना है इसमें। प्रोफ़ेसनालिटी नाम की तो कोई चीज़ ही नहीं है इसमें! 

चाय का कप लेकर छत पर किसी छांव के टुकड़े तले बैठ गया वो। मैंने उससे कहा भैया कुर्सी पर बैठ जाओ तो किसी पोएट् की तरह क्या कहता है पता है...? बड़े फिलोसोफिकल अंदाज़ में बोला कि सर हम इसी मिट्टी से उगे हैं और एक दिन इसी में दब जाएंगे। और छत पर खड़ी धूप को देखने लगा। जैसे अपनी दुल्हन को देख रहा हो। मुझे तो इससे चिढ़ होने लगी है। सच में!

मैं कितना बिजी बिजी हूँ, कितना कम कम ज़िंदगी जीता हूँ। मैंने कब इस कच्चे आर्टिस्ट की तरह अपनी छत पर खड़ी धूप को देखा है? कब थोड़ा सा वक़्त निकालकर हवा के होंठों से नमी पी? कब किसी गर्दन को जंगली होकर चूमा है दोपहर जितनी देर तक?

मैं कब अपने बिजी शेड्यूल के बीच जीना भूल गया? कब मैंने आख़िरी बार प्रेम किया किसी से? ये मुझे क्या हो गया है?! 

तुम इस पेंटर से कहो कि जाए यहाँ से। वर्ना मैं आज जल जल कर सूरज हो जाऊँगा। अपनी धूप से हर जवानी की व्यस्तताएं जलाकर राख कर दूँगा! 

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हो सकता है

 मौसम विभाग ने कहा था की दस तारिख को बारिश होगी  उसने कहा था की दस तारीख को मिलेंगे  न बारिश हुई न वह मिलने आई।  हो सकता है इन दो बातों का एक दूजे से कोई लेना देना न हो। 

जैसे...

वॉयलिन की कोई उदास धुन बजाते हुए, जैसे मर गया हो कोई संगीतकार। जैसे कोई बूढ़ा ठहर गया हो अपनी आखिरी खुराक खाने से पहले ही। जैसे मुस्कराते हुए हिरन की गर्दन काट दी हो शिकारी ने और वह भूल गया हो आखिरी तड़प के दर्द को चेहरे पर लाना।  जैसे पुकारा हो तुमने मेरा नाम आखिरी बार जैसे मैं कर रहा हूँ इंतजार तुमसे मिलने का,  आखिरी बार।

वे दिन....

मैं अक्सर काम के सिलसिले में उसके घर की गली से गुजरता हूँ तो ख्याल आता है कि कहीं वह एक दफ़ा दिख जाए तो दिल को चैन आए. मगर वह तो ऐसे ग़ायब है कि कहीं कोई इशारा नहीं मिलता. चाहत है कि उससे मुलाकातों का सिलसिला फ़िर से शुरू हो. भले ही वह कुछ बोले न पर मेरे साथ मुझसे सटकर तो बैठे. जैसे कभी बैठे थे हम राजीव चौक के सेंट्रल पार्क में. एक दूजे में खोए मगर इक-दूजे से ही बे-ख़बर. वे दिन.... ♥