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मेरे ऑफिस के ठीक सामने एक बस स्टैंड है। पर में हर शाम अगले स्टैंड तक चलते हुए जाना पसंद करता हूँ। यह मेरे लिए हर शाम दिनभर ऑफिस में काम के बाद एक तरह का जीवन को जीना है।
एक शाम से खूबसूरत कुछ नहीं होता। धीरे धीरे दूर से आती हुई, ख़ामोशी ओढ़े एक शाम।
शाम की यह ख़ामोशी असल में बहुत-सी आवाजों से मिलकर बनी होती है। सड़क किनारे खेलते हुए बच्चों का शोर, चाय-सिगरेट की दुकानों पर बैठे मजदूरों की बेपरवाह हँसी, कहीं दूर से गुज़रती हुई बस के हॉर्न का शोर, दूर कहीं से सुनाई पड़ता झींगुरों का उदास गीत, दिनभर काम के बाद थकी हुई, गोद में बच्चे लिए घर लौटती औरतों की बेबसी का शोर।
सब कुछ तेज़ रफ्तार से गुजरता हुआ मग़र कितना ठहरा हुआ। जैसे जिंदगी।
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