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होंठो से मुझे देखो

तेरी यादों को छुपा लूँ अपने ब्लॉग्स के ड्राफ़्ट में
भेज दूँ अपनी तन्हाई तुझे, 
भरकर खाकी लिफाफे में

लोग जब अपने घरों को लौटने लगते हैं
जब दोपहर के वक्त पसरने लगती है उदासी
तब न जाने ये कैसे खयाल आते हैं

कंप्युटर, प्रिंटर, मेज़ सड़क से उड़ती रेत से ढंक जाते हैं 
जैसे बीते लम्हों की याद से बचना नामुमकिन हो

पर एक दिन जब मिलेंगे हम किसी बस की आखिरी सीट पर 
टकरा जाएंगे किसी किस्से के दिलचस्प से इक मोड़ पर

तब तुम मुझे याद दिलाना
कि तुम से कोई बात कहनी है
जिसे सुनकर तुम आँखों से मुस्कराओ
और होंठो से मुझे देखो।

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हो सकता है

 मौसम विभाग ने कहा था की दस तारिख को बारिश होगी  उसने कहा था की दस तारीख को मिलेंगे  न बारिश हुई न वह मिलने आई।  हो सकता है इन दो बातों का एक दूजे से कोई लेना देना न हो। 

जैसे...

वॉयलिन की कोई उदास धुन बजाते हुए, जैसे मर गया हो कोई संगीतकार। जैसे कोई बूढ़ा ठहर गया हो अपनी आखिरी खुराक खाने से पहले ही। जैसे मुस्कराते हुए हिरन की गर्दन काट दी हो शिकारी ने और वह भूल गया हो आखिरी तड़प के दर्द को चेहरे पर लाना।  जैसे पुकारा हो तुमने मेरा नाम आखिरी बार जैसे मैं कर रहा हूँ इंतजार तुमसे मिलने का,  आखिरी बार।

वे दिन....

मैं अक्सर काम के सिलसिले में उसके घर की गली से गुजरता हूँ तो ख्याल आता है कि कहीं वह एक दफ़ा दिख जाए तो दिल को चैन आए. मगर वह तो ऐसे ग़ायब है कि कहीं कोई इशारा नहीं मिलता. चाहत है कि उससे मुलाकातों का सिलसिला फ़िर से शुरू हो. भले ही वह कुछ बोले न पर मेरे साथ मुझसे सटकर तो बैठे. जैसे कभी बैठे थे हम राजीव चौक के सेंट्रल पार्क में. एक दूजे में खोए मगर इक-दूजे से ही बे-ख़बर. वे दिन.... ♥