उसने कहा की कितना भी परेशां हो लो, एक दिन सब ठीक हो ही जाता है। मैनी आधी मुस्कुरुहत के साथ उसे देखने लगा। मैंने सोचा की हाँ एक दिन सब ठीक हो जाता है मगर उसे ठीक करने वाला कोई होता है जिसे हम नहीं देख पाते।
अगले हफ्ते से लॉक डाउन खुलने की हर उम्मीद नाकाम रही। मैं अब उकता गया हूँ सारा घर अकेले सँभालते हुए। मुझे खीज होती है। मैं कहीं दीवार पे अपना सर फोड़ना चाहता हूँ मगर फिर याद आता है की गैस का सिलिंडर भरवाना है। मैं एटीएम के लिए घर से निकल जाता हूँ। ऐसा नहीं है की पैसे नहीं है मगर अगले महीने की फिक्र है की अगर सब नार्मल नहीं हुआ तो बुरा फँसूँगा। मैं अपने भाई से पूछता हूँ की तू कहीं से जुगाड़ कर सकता है कुछ रुपये? वह मेरी तरफ होंठ दबाकर बेबसी से देखता है। मुझे उसमें मैं दिखाई देता हूँ। और मैं अपने आप को पापा की जगह पता हूँ। मुझे वे दिन यद् हो आते हैं जब पापा मुझसे पूछा करते थे की रोहन, तेरे पास थोड़े बहुत होंगे क्या ? और मैं अपनी किताबों के लालच में पैसे दबाये बिलकुल अपने छोटे भाई की तरह मुंह बनता था। यही सोचकर मैं भाई से कुछ नहीं कहता। मैं बस पापा से कहता हूँ की पता नहीं ये सब आपने कैसे किया। मैं तो इतने में ही उलझ गया हूँ। पापा मुस्कुराते हैं। मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहते हैं की शुरुआत हमेशा मुश्किल लगती है मगर तू कर लेगा। मैं पापा से कहना चाहता हूँ मगर नहीं कहता की मुझे आपको पहले समझना चाहिये था मगर मैं नाकाम रहा। फिर सोचता हूँ क्यों न उनको अब इन सारी जिम्मेदारियों से मुक्त कर दूँ और उन्हें सही मायने में समझ लूँ।
ये सोचते हुए मुझे अच्छा महसूस होता है। हिम्मत मिलती है। और मैं अगली लड़ाई के लिए तैयार हो जाता हूँ।

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