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मुझे खुद भी नहीं पता..

 सुबह का वही डेली रूटीन। उठना नहाना कॉफी सफाई और किताब। मॉर्गन हौसल कहते  हैं की पेसिमिस्म इस सेडक्टिव। यानि निराशा ज्यादा लुभावनी होती है। अचानक चिंता शुरू होती है की आज मार्किट का क्या होगा। पैसे काम होंगे या बढ़ेंगे। इस महीने का किराया राशन क्या मुझे अकेले ही भरना पड़ेगा या कोई मदद आएगी फरिश्ता बनकर। काश आ जाये। लॉक डाउन जल्दी खुल जाये। कोरोना जल्दी भाग जाये। ऐसा हो तो कितना अच्छा हो।

दिन उग आया है। 

भाई बहन के साथ हंसी मजाक है। खाना है। मम्मी है। बातें हैं। मैं अंदर से चिंतित हूँ और विचलित भी। पर काम करता जाता हूँ। चाय आती है और फिर काम करने लग जाता हूँ।  एक दो मार्किट एनालिसिस के वीडियो देखता हूँ और कुछ सीखने का प्रयत्न करता हूँ की खुद का भविष्य सुधार सकूँ और दुनिया की रेस में भाग ले सकूँ। इसी बीच किसी के होंठ याद आते हैं। कोई चेहरा आहिस्ता से आँखों में उतरता है और मैं कहीं खो जाता हूँ। कुछ लिखने का मन होता है मगर दिमाग में काम भरा है। मैं आजकल शायद इस अवचेतन अवस्था में कैद हो गया हूँ। काम काम और सिर्फ काम। 

शाम की बात। 

लैपटॉप की दाहिने तरफ कॉफ़ी का मग रखा है। मन अशांत और थका हुआ है। काम का मन नहीं। काम वाले का मैसेज है मगर देखने का मन नहीं। कभी कभी मुझे खुद पता नहीं होता की मैं क्या चाहता हूँ। 



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हो सकता है

 मौसम विभाग ने कहा था की दस तारिख को बारिश होगी  उसने कहा था की दस तारीख को मिलेंगे  न बारिश हुई न वह मिलने आई।  हो सकता है इन दो बातों का एक दूजे से कोई लेना देना न हो। 

जैसे...

वॉयलिन की कोई उदास धुन बजाते हुए, जैसे मर गया हो कोई संगीतकार। जैसे कोई बूढ़ा ठहर गया हो अपनी आखिरी खुराक खाने से पहले ही। जैसे मुस्कराते हुए हिरन की गर्दन काट दी हो शिकारी ने और वह भूल गया हो आखिरी तड़प के दर्द को चेहरे पर लाना।  जैसे पुकारा हो तुमने मेरा नाम आखिरी बार जैसे मैं कर रहा हूँ इंतजार तुमसे मिलने का,  आखिरी बार।

ख़यालों के कुछ टुकड़े

एक मजदूर प्रेमी अपने महीने भर की तनख्वाह से अपनी महबूबा के लिए एक चाँद लाया. और महबूबा चाँद पर बैठकर किसी शहजादे के पास चली गई. *** किताबें इंसान को बिना पिए ही शराबी बना देती है। *** कभी कभी मैं महसूस करता हूँ कि मैं सर्द हवा का एक झोंका हूँ. जो हर सुबह एक नीली तितली की पीठ पर बैठकर अपने काम पर जाता है. और शाम को लौटता है एक बादल बनकर. *** ऑफिस का घर से दूर होना कितना मजेदार है! 2 घंटे की भीड़ भरी तन्हाई में कितना कुछ लिखा जा सकता है। *** इस दुनिया में हर चीज एक करिश्मा है. यह करिश्मा ही है कि मैं ऑफिस में कीबोर्ड पर टिक टिक करते वक़्त यह महसूस करता हूँ कि मैं अपनी अपनी प्रेमिका को ख़त लिख रहा हूँ. ख़त, जो हर शाम अधूरा रह जाता है. ***