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पता नहीं क्यूँ...


कौन सी जा है जहाँ जल्वा-ए-माशूक़ नहीं 
शौक़-ए-दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर 

~ अमीर मीनाई

एक शाम एक चेहरा दिखा
और प्यास बनकर गुज़र गया। 
               *****
ऐसी ही किसी एक शाम की बात।

किसी ने कहा कि ओके, कल दोपहर मिलते हैं। किसी ने कहा मैं घर पर ही कॉफी बना दूँगी। किसी ने कहा मन तो है मग़र मौका नहीं। किसी ने कहा सॉरी, फ़िर कभी।

तो किसी ने कहा कि पागल हो क्या? घर पे मम्मी होती है।

तुमने मग़र ऐसा कुछ नहीं कहा। तुम सिर्फ़ सड़क के उस पार से मुझे बार बार मुड़ कर देखती रही और खो गई अनचिन्हे चेहरों की भीड़ में। 

अज़ीब बात है कि फ़िर भी सिर्फ़ तुम याद आई। क्यूँ? 

पता नहीं। जाने दो। 

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जैसे...

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