तेरी यादों को छुपा लूँ अपने ब्लॉग्स के ड्राफ़्ट में भेज दूँ अपनी तन्हाई तुझे, भरकर खाकी लिफाफे में लोग जब अपने घरों को लौटने लगते हैं जब दोपहर के वक्त पसरने लगती है उदासी तब न जाने ये कैसे खयाल आते हैं कंप्युटर, प्रिंटर, मेज़ सड़क से उड़ती रेत से ढंक जाते हैं जैसे बीते लम्हों की याद से बचना नामुमकिन हो पर एक दिन जब मिलेंगे हम किसी बस की आखिरी सीट पर टकरा जाएंगे किसी किस्से के दिलचस्प से इक मोड़ पर तब तुम मुझे याद दिलाना कि तुम से कोई बात कहनी है जिसे सुनकर तुम आँखों से मुस्कराओ और होंठो से मुझे देखो।