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तमाशा है सब...

मेरे नए दोस्त मेरे घर आए। उन्होंने कहा कि तुम कुछ नहीं कर सकोगे क्यूँकि तुम थोड़े अलग हो। आर्टिस्ट का यहाँ कोई फ्यूचर नहीं होता।  मैं यह सुनकर घबरा गया। मुझे पसीना आने लगा। अगले ही दिन से मैंने नौकरी ढूँढनी शुरू कर दी। एक सप्ताह बाद मैं एक अच्छी कंपनी में जॉब करने लगा।  मैं ख़ुश था। इस बात पर नहीं कि मुझे नौकरी मिल गई, इस बात के लिए कि वे लोग कोई नौकरी नहीं कर रहे थे पर मैं अब कर रहा था।  मुझे लगा वे लोग उदास होंगे। मैं उन्हें देखने उनमें से एक के घर गया। मैं चौंक गया कि वे सारे लोग एक साथ बैठे थे और कुछ बातें कर रहे थे। मुझे लगा शायद अपना अपना दुःख बांट रहे हैं आपस में।  मग़र नहीं। वे लोग मनाली जाने का प्लान बना रहे थे। उन्होंने मुझे देखते हुए कहा कि सॉरी यार, हम तुम्हें ले चलना चाहते हैं पर अब तो तुम जॉब करने लगे हो तो तुम तो जा नहीं पाओगे। और वे हँसने लगे।  मुझे लगा मेरे साथ धोखा हुआ है। मैं झेंप गया। मैंने बनावटी मुस्कान बिखरते हुए कहा कि अरे नहीं, मैं वैसे भी नहीं जाना चाहता, मुझे पसंद नहीं ये घूमना वूमना। वे लोग फ़िर हँसने लगे। ज़ोर ज़ोर से। मु...

दोस्ती ठहर गई

स्कूल यूनीफॉर्म फॉर्मल ड्रेस से रिप्लेस हो गई। किताबें ऑफिस फाइल्स में बदल गई। गले में हाथ डाले बैठे हुए न जाने कितने ज़माने हो गए। सब कुछ इतनी सरलता से बीतता गया कि जैसे बीती हुई मस्तियाँ कोई स्वपन हों।  मग़र कुछ लम्हें थे जो एक तस्वीर की तरह ठहरे रहे। मन बार बार उनके क़रीब जाने को चाहता।  कुछ बरसों बाद हम मिले।  वह मिलना ऐसा था कि जैसे बादल आपस में मिलते हैं। हमने टूट कर बातें की। बेवकूफ़ी भरे चुटकुले कहे। साथ साथ चले। पुरानी यादों को ताज़ा किया। नई यादों की नींव रखी। और फिर बिछड़ गए। एक लंबे समय के लिए। न कॉल। न व्हट्सएप। न ही शिकायतें। सब ने अपना अपना बिजी रहने का बहाना चुन लिया। कुछ कैरियर में लग गए। कुछ ने घर बनाया। और कुछ ने घर बसाया। इन सबके बीच हम बेमौसम बारिश की तरह मिले। मिले और बिछड़ गए। मौसम बीतते गए और दोस्ती ठहर गई। अक्सर कोई याद अचानक आकर हाथ थाम लेती है तो मैं उसके साथ पुरानी तस्वीरें देख लेता हूँ। उस पेंटिंग के सामने कुछ देर खड़ा हो जाता हूँ जो मैंने शब्दों से उतारी थी। मग़र मन नहीं भरता कि जो बात गले में हाथ डाले साथ चलने में है वह याद करने ...

मेरा लिखना क्या है?

क्या होता अगर मैं उन बातों को लिख पाता. वे बातें जो तुम्हारे मेरे बीच कभी हुई नहीं. क्या होता ग़र हम कुछ दिनों और साथ रहते. क्या होता अगर हम कुछ देर और सेंट्रल पार्क में हाथ थामे टहलते और चूमने के लिए कोई कोना तलाशते. क्या होता अगर... पता नहीं क्या होता. एक कहानी लिखने के बारे में सोचना मुझे रोमांच से भर देता है. कैसे एक बीज में छुपा होता है एक पेड़? कैसे बूँद बूँद बारिश में छुपा होता है समंदर? कभी सोचा है तुमने? मैंने सोचा. इसलिए शब्दों से उगा ली कई सारी कहानियाँ. इन दिनों मैं हॉस्पिटल के चक्कर काट रहा हूँ. तरह-तरह के मरीजों को देखकर आभास होता है कि वक्त तेज़ी से बढ़ता जा रहा है मग़र जिंदगी ठहर सी गई है. एक तेज चुभन मेरी रीढ़ की हड्डी से होकर गुजर जाती है. हो सकता है तुम इसे मेरा कमीनापन कहो मग़र मुझे इसमें भी एक कहानी दिखाई देने लगती है. मैं खुद को इसी हॉस्पिटल के किसी बिस्तर पर दीवार का सहारा लिए बैठे देखता हूँ. मैं किस बीमारी के चलते यहाँ आया मुझे मालूम नहीं मग़र मैं इतना स्वस्थ हो चुका हूँ कि मेरे हाथ में मेरा लैपटॉप है और दिमाग़ में कई सारी कहानियाँ.  मैं अक्सर सो...

कोरोना की ऐसी तैसी

हम फिर प्यार करेंगे  और फिर चूमेंगे ऑफिस की सीढ़ियों में खड़े होकर,  एक दूजे को। कोरोना की ऐसी तैसी।

मैं भूल जाना चाहता हूँ

 ब्लू जीन्स और ओलिव ग्रीन टी शर्ट पहने हुए, हाथ में किताब लिए और बेख़याली की आँखों में झांकते हुए मैं भूल जाना चाहता हूँ, सब कुछ।  मैं भूल जाना चाहता हूँ अपने वॉलेट में रखी उसकी तस्वीर को, कल रात से चुप तांकते उसके खतों को, गुजर चुकी उस शाम को, उसकी छत को छूकर आती इस हवा को। सब कुछ।  खुद को भी।  तुम को भी।  सब कुछ। [ पेंटिंग - आर्ट यू। Art you ]

मुझे खुद भी नहीं पता..

 सुबह का वही डेली रूटीन। उठना नहाना कॉफी सफाई और किताब। मॉर्गन हौसल कहते  हैं की पेसिमिस्म इस सेडक्टिव। यानि निराशा ज्यादा लुभावनी होती है। अचानक चिंता शुरू होती है की आज मार्किट का क्या होगा। पैसे काम होंगे या बढ़ेंगे। इस महीने का किराया राशन क्या मुझे अकेले ही भरना पड़ेगा या कोई मदद आएगी फरिश्ता बनकर। काश आ जाये। लॉक डाउन जल्दी खुल जाये। कोरोना जल्दी भाग जाये। ऐसा हो तो कितना अच्छा हो। दिन उग आया है।  भाई बहन के साथ हंसी मजाक है। खाना है। मम्मी है। बातें हैं। मैं अंदर से चिंतित हूँ और विचलित भी। पर काम करता जाता हूँ। चाय आती है और फिर काम करने लग जाता हूँ।  एक दो मार्किट एनालिसिस के वीडियो देखता हूँ और कुछ सीखने का प्रयत्न करता हूँ की खुद का भविष्य सुधार सकूँ और दुनिया की रेस में भाग ले सकूँ। इसी बीच किसी के होंठ याद आते हैं। कोई चेहरा आहिस्ता से आँखों में उतरता है और मैं कहीं खो जाता हूँ। कुछ लिखने का मन होता है मगर दिमाग में काम भरा है। मैं आजकल शायद इस अवचेतन अवस्था में कैद हो गया हूँ। काम काम और सिर्फ काम।  शाम की बात।  लैपटॉप की दाहिने तरफ कॉफ़ी का मग र...

पता नहीं कैसे। ...

उसने कहा की कितना भी परेशां हो लो, एक दिन सब ठीक हो  ही जाता है। मैनी आधी मुस्कुरुहत के साथ उसे देखने लगा। मैंने सोचा की हाँ एक दिन सब ठीक हो जाता है मगर उसे ठीक करने वाला कोई होता है जिसे हम नहीं देख पाते।  अगले हफ्ते से लॉक डाउन खुलने की हर उम्मीद नाकाम रही। मैं अब उकता गया हूँ सारा घर अकेले सँभालते हुए। मुझे खीज होती है। मैं कहीं दीवार पे अपना सर फोड़ना चाहता हूँ मगर फिर याद आता है की गैस का सिलिंडर भरवाना है। मैं एटीएम के लिए घर से  निकल जाता हूँ। ऐसा नहीं है की पैसे नहीं है मगर अगले महीने की फिक्र है की अगर सब नार्मल नहीं हुआ तो बुरा फँसूँगा। मैं अपने भाई से पूछता हूँ की तू कहीं से जुगाड़ कर सकता है कुछ रुपये? वह मेरी तरफ होंठ दबाकर बेबसी से देखता है। मुझे उसमें मैं दिखाई देता हूँ। और मैं अपने आप को पापा की जगह पता हूँ। मुझे वे दिन यद् हो आते हैं जब पापा मुझसे पूछा करते थे की रोहन, तेरे पास थोड़े बहुत होंगे क्या ? और मैं अपनी किताबों के लालच में पैसे दबाये बिलकुल अपने छोटे भाई की तरह मुंह बनता था। यही सोचकर मैं भाई से कुछ नहीं कहता। मैं बस पापा से कहता हूँ की पता नहीं य...