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सभी पैरेंट्स के नाम एक पत्र....

कुछ पैरेंट्स को ये बात बुरी लग सकती है कि उनके बच्चे दिवाली की पूजा में आना भूल जाते हैं. उन्हें डाँट कर समझाना पड़ता है कि वे अपने पूर्वजों के रिवाज़ों को भूल रहे हैं. लेकिन ये बात समझने वाली है कि आपके बच्चों की अपनी इच्छायें हैं, सेलीब्रेसन के अपने तरीके अपने प्लान्स हैं. जिस तरह आप अपनी जवानी के दिनों में दोस्तों के साथ जुआ खेलना, बाजारों में घूमती लड़कियों को देखना, एक ही साइकिल पर चार-पाँच दोस्तों को बैठाकर धूम करना पसंद करते थे वैसे ही आज के बच्चों को फ़्रेंड्स के साथ पार्टी करना, नाइट-आउट करना, पब और डिस्को जाना पसंद हो सकता है. हो सकता है ऐसा न भी हो. कुछ और हो. कुछ भी हो. मगर आप अगर आज उन्हें उनकी इच्छाओं के विरुद्ध उनपर रिवाजों को थोपेंगे तो हो सकता है वे आपसे मन ही मन नफ़रत करने लगें, आपको कोसें. और यही एक छोटी-सी बात कल आपके घर के टूटने का कारण बनेगी. क्या आप ये सहन कर पाएंगे? धर्म, रिवाज, संस्कार आपके बच्चों, आपके परिवार से बढ़कर नहीं हो सकते. अगर हैं तो कहीं कुछ तो गड़बड़ है जिसे हमें सुधारने की जरूरत है. आपके बच्चों के साथ साथ आपको भी स्कूल जाने की जरूरत...

ख़यालों के कुछ टुकड़े

एक मजदूर प्रेमी अपने महीने भर की तनख्वाह से अपनी महबूबा के लिए एक चाँद लाया. और महबूबा चाँद पर बैठकर किसी शहजादे के पास चली गई. *** किताबें इंसान को बिना पिए ही शराबी बना देती है। *** कभी कभी मैं महसूस करता हूँ कि मैं सर्द हवा का एक झोंका हूँ. जो हर सुबह एक नीली तितली की पीठ पर बैठकर अपने काम पर जाता है. और शाम को लौटता है एक बादल बनकर. *** ऑफिस का घर से दूर होना कितना मजेदार है! 2 घंटे की भीड़ भरी तन्हाई में कितना कुछ लिखा जा सकता है। *** इस दुनिया में हर चीज एक करिश्मा है. यह करिश्मा ही है कि मैं ऑफिस में कीबोर्ड पर टिक टिक करते वक़्त यह महसूस करता हूँ कि मैं अपनी अपनी प्रेमिका को ख़त लिख रहा हूँ. ख़त, जो हर शाम अधूरा रह जाता है. ***

कभी-कभी

भरोसा नहीं होता कभी-कभी मुझे कि यह कविता मैंने लिखी है. कभी-कभी भरोसा नहीं होता कि इतवार की दोपहर में मेरे सीने पर तुम्हारे सिर की जगह किताब रखी हुई है. भरोसा नहीं होता कभी कभी कि सुबह हो गई है और मैं ज़िंदा हूँ. कभी कभी दिल करता है कि लिखूँ एक कविता सच्चे प्रेम के नाम पर, अब भरोसा नहीं होता.

इश्क़ में शहर होना

वे दोनों पीरागढ़ी चौक पर एक दिन अचानक मिले. उसके बाद वे हर रविवार यहाँ नियम से मिलने लगे. वह अपनी पल्सर पर हैलमेट लगाए पीरागढ़ी के मैन-स्टैंड पर ठीक दस बजे उसका इंतजार करता. वह अपने चेहरे पर स्कार्फ बांधे हमेशा ही लेट आती. उसे पॉल्यूशन से ज्यादा डर दिल्ली के कौने-कौने में बसे उसके रिश्तेदारों का होता. कहीं कोई देख ले तो शामत ही आ जाए. पीरागढ़ी चौक से वे आजादपुर की तरफ़ चल देते और उनकी बातों का सिलसिला चल पड़ता. ट्रक और बसों के भारी भरकम हॉर्न के दर्दनाक शोर की वजह से उन्हें अपनी बातों को कई बार और तेज़ आवाज़ में कहना पड़ता. दोनों चाहते कि वे कहीं रुककर थोड़ी देर कुछ बात कर लें. एक दूजे से पूछ लें कि तुम कैसे हो? मग़र दिल्ली जैसे शहर में भी उनके लिए दो पल आराम से बात करने के लिए जगह न होती. लोग उनके इर्दगिर्द इकठ्ठे हो जाते और उन्हें घूरते जो उन्हें बड़ा अनकंफर्टेबल लगता. दो सालों से वे इसी तरह मिलते और अपने ख्यालों में इश्क़ का शहर बुनते रहते. आजादपुर से आगे जाते हुए नॉर्थ कैम्पस में कुछ देर साथ चाय पीने के लिए ठहरते और फ़िर उसी पल्सर में एक दूजे से चिपके बातें करते हुए ...

ख़त

मेरी गर्दन पर अभी तक रखा हुआ है, उस शैतान के जंगली होकर चूमने का निशान। हालाँकि ये एक जन्म पुरानी बात है। ओ शैतान.... कहाँ हो तुम? कि प्रेमिका तुम्हारी, तन्हा है बिन तुम्हारे... 

किसी के होने को....

कभी ये दो किताबें मेरी सबसे पसंदीदा किताबें हुआ करती थी. अब भी है मग़र इनमें अब पहले जैसी बात न रही. ऐसा अक्सर हमारे साथ अपने प्रिय जनों को लेकर भी होता है. पता नहीं क्यूँ. वह मेरे नीचे वाले फ्लोर पर रहती थी. जब भी वह मेरे कमरे में आती, ये दो किताबें ही उठाती. पता नहीं उस पाँच साल की बच्ची को इन किताबों में क्या दिखता कि वह इनमें इस कदर रमी रहती कि उसे ये किताबें थमाकर हम उसकी शैतानियों से बचकर अपना जरूरी काम कर लेते थे. आज भी जब इन किताबों पर नज़र जाती है तो कमरा उसकी मोहक हँसी और बेपरवाह शरारतों से भर उठता है. मैंने ये तस्वीर उसकी मम्मी को वॉट्‍सऐप पर भेजते हुए लिखा कि ये उसे दिखाना और कहना कि यह एक बहाना भर है यह कहने का कि कोई तुम्हें याद कर रहा है. कि कभी-कभी किसी के होने को उसके होने की जरूरत नहीं होती. 

एक करोड़ की बोतल

संदीप नैयर अच्छा लिखते हैं. मैंने अपने डिप्रेशन के दिनों में उनकी किताब डार्क नाइट पढ़ी थी. वह इस उम्र के हिसाब से मेरे लिए डिप्रेशन-बस्टर साबित हुई. मैंने उनकी यह किताब पढ़ कर उनसे कहा कि अगर ऐसी ही कुछ किताबें हो तो बताइए, आजकल डिप्रेशन में हूँ, शायद ऐसी किताबें पढ़ कर इससे जल्दी बाहर आ सकूँ. उन्होंने मेरी हालत को समझते हुए कहा कि किसी काम में मन लगाएँ और कुछ रचनात्मक अवश्य करें. उन्होंने यह दो किताबें सुझाई जो अब तक कि सबसे इंट्रेस्टिंग किताबें साबित हुई मेरे लिए. कुछ दिनों बाद में एक वायलिन समंदर किनारे पढ़कर यूँ ही उनके साथ हुई बातचीत को देखने लगा, मुझे कुछ अचानक याद आया.मैंने उनसे पूछा कि आपने उस दिन यह क्यूँ कहा था कि कुछ रचनात्मक अवश्य करना? उन्होंने कहा, "रचनात्मक से मेरा अर्थ था जिस में आपका मन लगे, जिसे करके आपको रचनात्मक सुख और संतोष मिले। इसमें प्रेम करने और प्रेम पाने जैसा सुख होता है। हर व्यक्ति जो मन और प्रकृति से प्रेमी होता है उसका कोई न कोई रचनात्मक पैशन अवश्य होता है। इसलिए औरतें भी ऐसे पुरुषों को अधिक पसंद करती हैं जिनका कोई रचनात्मक पैशन होता ह...