कुछ पैरेंट्स को ये बात बुरी लग सकती है कि उनके बच्चे दिवाली की पूजा में आना भूल जाते हैं. उन्हें डाँट कर समझाना पड़ता है कि वे अपने पूर्वजों के रिवाज़ों को भूल रहे हैं. लेकिन ये बात समझने वाली है कि आपके बच्चों की अपनी इच्छायें हैं, सेलीब्रेसन के अपने तरीके अपने प्लान्स हैं. जिस तरह आप अपनी जवानी के दिनों में दोस्तों के साथ जुआ खेलना, बाजारों में घूमती लड़कियों को देखना, एक ही साइकिल पर चार-पाँच दोस्तों को बैठाकर धूम करना पसंद करते थे वैसे ही आज के बच्चों को फ़्रेंड्स के साथ पार्टी करना, नाइट-आउट करना, पब और डिस्को जाना पसंद हो सकता है. हो सकता है ऐसा न भी हो. कुछ और हो. कुछ भी हो. मगर आप अगर आज उन्हें उनकी इच्छाओं के विरुद्ध उनपर रिवाजों को थोपेंगे तो हो सकता है वे आपसे मन ही मन नफ़रत करने लगें, आपको कोसें. और यही एक छोटी-सी बात कल आपके घर के टूटने का कारण बनेगी. क्या आप ये सहन कर पाएंगे? धर्म, रिवाज, संस्कार आपके बच्चों, आपके परिवार से बढ़कर नहीं हो सकते. अगर हैं तो कहीं कुछ तो गड़बड़ है जिसे हमें सुधारने की जरूरत है. आपके बच्चों के साथ साथ आपको भी स्कूल जाने की जरूरत...