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किसी के होने को....

कभी ये दो किताबें मेरी सबसे पसंदीदा किताबें हुआ करती थी. अब भी है मग़र इनमें अब पहले जैसी बात न रही.

ऐसा अक्सर हमारे साथ अपने प्रिय जनों को लेकर भी होता है. पता नहीं क्यूँ.

वह मेरे नीचे वाले फ्लोर पर रहती थी. जब भी वह मेरे कमरे में आती, ये दो किताबें ही उठाती. पता नहीं उस पाँच साल की बच्ची को इन किताबों में क्या दिखता कि वह इनमें इस कदर रमी रहती कि उसे ये किताबें थमाकर हम उसकी शैतानियों से बचकर अपना जरूरी काम कर लेते थे. आज भी जब इन किताबों पर नज़र जाती है तो कमरा उसकी मोहक हँसी और बेपरवाह शरारतों से भर उठता है.

मैंने ये तस्वीर उसकी मम्मी को वॉट्‍सऐप पर भेजते हुए लिखा कि ये उसे दिखाना और कहना कि यह एक बहाना भर है यह कहने का कि कोई तुम्हें याद कर रहा है.

कि कभी-कभी किसी के होने को उसके होने की जरूरत नहीं होती. 

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हो सकता है

 मौसम विभाग ने कहा था की दस तारिख को बारिश होगी  उसने कहा था की दस तारीख को मिलेंगे  न बारिश हुई न वह मिलने आई।  हो सकता है इन दो बातों का एक दूजे से कोई लेना देना न हो। 

जैसे...

वॉयलिन की कोई उदास धुन बजाते हुए, जैसे मर गया हो कोई संगीतकार। जैसे कोई बूढ़ा ठहर गया हो अपनी आखिरी खुराक खाने से पहले ही। जैसे मुस्कराते हुए हिरन की गर्दन काट दी हो शिकारी ने और वह भूल गया हो आखिरी तड़प के दर्द को चेहरे पर लाना।  जैसे पुकारा हो तुमने मेरा नाम आखिरी बार जैसे मैं कर रहा हूँ इंतजार तुमसे मिलने का,  आखिरी बार।

वे दिन....

मैं अक्सर काम के सिलसिले में उसके घर की गली से गुजरता हूँ तो ख्याल आता है कि कहीं वह एक दफ़ा दिख जाए तो दिल को चैन आए. मगर वह तो ऐसे ग़ायब है कि कहीं कोई इशारा नहीं मिलता. चाहत है कि उससे मुलाकातों का सिलसिला फ़िर से शुरू हो. भले ही वह कुछ बोले न पर मेरे साथ मुझसे सटकर तो बैठे. जैसे कभी बैठे थे हम राजीव चौक के सेंट्रल पार्क में. एक दूजे में खोए मगर इक-दूजे से ही बे-ख़बर. वे दिन.... ♥