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किसी के होने को....

कभी ये दो किताबें मेरी सबसे पसंदीदा किताबें हुआ करती थी. अब भी है मग़र इनमें अब पहले जैसी बात न रही.

ऐसा अक्सर हमारे साथ अपने प्रिय जनों को लेकर भी होता है. पता नहीं क्यूँ.

वह मेरे नीचे वाले फ्लोर पर रहती थी. जब भी वह मेरे कमरे में आती, ये दो किताबें ही उठाती. पता नहीं उस पाँच साल की बच्ची को इन किताबों में क्या दिखता कि वह इनमें इस कदर रमी रहती कि उसे ये किताबें थमाकर हम उसकी शैतानियों से बचकर अपना जरूरी काम कर लेते थे. आज भी जब इन किताबों पर नज़र जाती है तो कमरा उसकी मोहक हँसी और बेपरवाह शरारतों से भर उठता है.

मैंने ये तस्वीर उसकी मम्मी को वॉट्‍सऐप पर भेजते हुए लिखा कि ये उसे दिखाना और कहना कि यह एक बहाना भर है यह कहने का कि कोई तुम्हें याद कर रहा है.

कि कभी-कभी किसी के होने को उसके होने की जरूरत नहीं होती. 

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