कुछ पैरेंट्स को ये बात बुरी लग सकती है कि उनके बच्चे दिवाली की पूजा में आना भूल जाते हैं. उन्हें डाँट कर समझाना पड़ता है कि वे अपने पूर्वजों के रिवाज़ों को भूल रहे हैं.
लेकिन ये बात समझने वाली है कि आपके बच्चों की अपनी इच्छायें हैं, सेलीब्रेसन के अपने तरीके अपने प्लान्स हैं.
जिस तरह आप अपनी जवानी के दिनों में दोस्तों के साथ जुआ खेलना, बाजारों में घूमती लड़कियों को देखना, एक ही साइकिल पर चार-पाँच दोस्तों को बैठाकर धूम करना पसंद करते थे वैसे ही आज के बच्चों को फ़्रेंड्स के साथ पार्टी करना, नाइट-आउट करना, पब और डिस्को जाना पसंद हो सकता है.
हो सकता है ऐसा न भी हो. कुछ और हो.
कुछ भी हो. मगर आप अगर आज उन्हें उनकी इच्छाओं के विरुद्ध उनपर रिवाजों को थोपेंगे तो हो सकता है वे आपसे मन ही मन नफ़रत करने लगें, आपको कोसें. और यही एक छोटी-सी बात कल आपके घर के टूटने का कारण बनेगी.
क्या आप ये सहन कर पाएंगे?
धर्म, रिवाज, संस्कार आपके बच्चों, आपके परिवार से बढ़कर नहीं हो सकते. अगर हैं तो कहीं कुछ तो गड़बड़ है जिसे हमें सुधारने की जरूरत है. आपके बच्चों के साथ साथ आपको भी स्कूल जाने की जरूरत है.
प्रेम से बढ़कर कोई धर्म नहीं होता
अपने परिवार के साथ रोज शाम खाना खाने के रिवाज से बढ़कर कोई रिवाज नहीं होता
और न ही कोई संस्कार दूसरों की इच्छाओं का सम्मान करने के संस्कार से बड़ा होता है.
और अंत में एक और बात -
आपके बच्चे सिर्फ़ आपके बच्चे नहीं है,
बल्कि उनकी इच्छाओं, उनके सपनों,
उनके अरमानों के बच्चे हैं.
जितना प्रेम आप उन्हें करते हैं उतना ही प्रेम उन्हें उनकी आज़ादी और उनकी मस्ती से होता है.
मै भी अपने पैरेंट्स से कहना चाहता हूँ कि आप अगर मुझे कुछ देना चाहते हैं तो आज़ादी दें. मगर उनसे कहने की जरूरत महसूस नहीं होती, वे ख़ुद समझते हैं. और मैं इस बात के लिए उनका शुक्रगुजार हूँ. हमेशा रहूँगा.
बुध्द ने कहा था या शायद पता नहीं किसने कि अगर आप किसी फ़ूल से प्यार करते हैं तो उसे रोज़ पानी दें, उसका ख़्याल रखें. उसे तोड़े नहीं. यही बात हर रिश्ते पर लागू होती है. चाहे रिश्ता कोई भी हो.
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और अगर आपको लगे कि ये बातें आपकी विचारधारा से मेल नहीं खाती है या इसमें कुछ गलत है तो इसे सिर्फ़ एक ढोंगी बाबा का प्रवचन समझकर भुला दें. किसी भी बात पर भरोसा करने से पहले अपने सिक्स्थ सेन्स की सुनें.
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शुक्रिया. हैप्पी दिवाली. ❤

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